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| कार्टून चित्र |
आज मैंने सिमिट्री मैगजीन में प्रति पदार्थ (Antimatter) के बारे में कुछ पढ़ा तो सोचा क्यों न उसपर ही लिखा जाए। चूँकि अंग्रेजी में तो आपको symmetrymagazine पर ही मिल जायेगा अतः यहाँ पर हिन्दी में लिख रहा हूँ। यहाँ पर दिया गया कार्टून चित्र भी वहाँ से ही लिया गया है। पुस्तकों और फिल्मों के लिए प्रति-पदार्थ कल्पित विज्ञान की तरह है लेकिन यह एक वास्तविकता भी है। प्रति-पदार्थ की उपस्थित पदार्थ के साथ मिलकर अधिकतम ऊर्जा जनित करती है जो अन्य किसी प्रक्रिया से सम्भव नहीं है अतः फिल्मों और विज्ञान कल्पित पुस्तकें इस तरह के बम्बों पर विचार करती हैं जिसमें एक प्रति-पदार्थ का गोला आपके निकट फेंक दिया जाए और आप उसकी चपेट में आकर अपने आप ही मिट जावो। प्रति-पदार्थ की कुछ विशेषतायें निम्नलिखित हैं:
प्रति-पदार्थ पिंजरा (trap) भी कुछ होता है। ध्यान रहे यहाँ पिंजरा शब्द गलत हो सकता है लेकिन प्रति-पदार्थ साधारण जल की तरह नहीं है जिसे किसी संदूक में अथवा अन्य बर्तन में भरकर रख दें। जैसे उच्च सांद्रता वाले अम्ल को हम हर किसी तरह के बर्तन में नहीं रख सकते अथवा सोडियम को हवा के संपर्क में रखते ही उसका ऑक्सीकरण हो जाता है। उसी तरह यदि प्रति-पदार्थ को कहीं भी किसी सामान्य पदार्थ के साथ संपर्क में आने दिया गया तो वहाँ हमें उसी मात्रा में केवल ऊर्जा मिलेगी। अतः इसको रखने के लिए वैज्ञानिकों ने भिन्न विधि अपनाई। आवेशित प्रति-कणों को पेनिंग ट्रैप (penning trap) नामक उपकरण में रखा जा सकता है। - बिग बैंग अथवा महाविस्फोट सिद्धांत (Big-bang theory) के अनुसार जब यह घटना हुई उसके तुरंत बाद पदार्थ और प्रति-पदार्थ को मिलकर उसे ऊर्जा के रूप में ही रहना चाहिए था। लेकिन ऐसा माना जाता है कि अरबों कणों में किसी एक में असममिति आ गयी और उसके परिणामस्वरूप पदार्थ की मात्रा प्रति-पदार्थ से अधिक हो गयी। ऐसा क्यों हुआ और क्या वास्तव में ऐसा हुआ? इसपर अभी शोध चल रहा है।
- आकाशीय घटनाओं में प्रति-पदार्थ को प्रेक्षित किया गया है जिसकी कुछ मात्रा हमेशा हमारे पास भी पहुंचती रहती है और इसके मापन से ज्ञात होता है कि पृथ्वी पर कम से कम एक कण प्रति वर्ग मीटर से अधिकतम सौ कण प्रति मीटर दर से पहुँचते रहते हैं। इसके अतिरिक्त पृथ्वी पर भी प्रतिकणों के स्रोत उपलब्ध यहीं जिसमें केला भी एक उदाहरण है। केले से प्रति 75 मिनट में एक पॉजिट्रॉन (इलेक्ट्रॉन के तुल्य प्रतिकण) निकलता है। केले में उपस्थित प्राकृतिक समस्थानिक पोटेशियम-40 के क्षय से हमें पॉजिट्रॉन मिलता है। हमारे दिमाग में भी अल्प मात्रा में पोटेशियम-40 होता है अर्थात हमारे दिमाग से भी पॉजिट्रॉन निकलते रहते हैं लेकिन पदार्थ के साथ मिलकर उनके विलोपन होने के कारण प्रेक्षित करना मुश्किल होता है।
- वैज्ञानिकों ने बहुत कम मात्रा में प्रति-पदार्थ का निर्माण किया है : प्रति-पदार्थ की पदार्थ के साथ अन्योन्य क्रिया से बहुत विशाल मात्रा में ऊर्जा जनित की जा सकती है। एक ग्राम प्रति-पदार्थ से जनित ऊर्जा एक बड़े नाभिकीय बम्ब के धमाके से भी कहीं अधिक हो सकती है। लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा जनित प्रति-पदार्थ की मात्रा बहुत कम है। आज तक प्रति-पदार्थ के रूप में अमेरिका स्थित फर्मी प्रयोगशाला में 15 नैनोग्राम (एक ग्राम का एक अरबवाँ भाग), जिनेवा में स्थिति प्रयोगशाला सर्न (CERN) में 1 नैनोग्राम और जर्मनी स्थित डेजी (DESY) प्रयोगशाला में 2 नैनो ग्राम प्रति-प्रोटोन निर्मित किये गए हैं। इस तरह से इन सभी प्रतिपदार्थों से प्राप्त ऊर्जा का उपयोग किया जाए तो एक कप चाय नहीं बनाई जा सकती। प्रति-पदार्थ निर्माण की दक्षता, निर्माण लागत और उनका भंडारण बहुत अधिक विकट समस्या हैं। एक ग्राम प्रति-पदार्थ बनाने के लिए लगभग ढाई करोड़ किलो-वाट-घंटा ऊर्जा और एक लाख ख़रब से अधिक रूपये खर्च होंगे।इस ट्रैप को लॉफ ट्रैप कहते हैं जो चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से रोककर रखा जाता है। चारों तरफ इतना अधिक चुम्बकीय क्षेत्र रखा जाता है कि प्रतिकण बहुत छोटे क्षेत्र में ही घूम सकते हैं। हालाँकि उदासीन कणों को ऐसे रखना सम्भव नहीं होता।
- प्रतिकण भी केवल आवेश और प्रचक्रण (spin) जैसे कुछ गुणों को छोड़कर कणों के समान ही होते हैं। इसमें उनका अर्ध-आयु काल और अन्योन्य क्रियाएं हैं। हालाँकि गुरुत्वीय अन्योन्य क्रिया को अभी तक मापन नहीं किया जा सका क्योंकि यह गिरते हुए सेव पर गुरुत्वीय बल देखने जितना आसान नहीं है।
- प्रतिकणों और प्रति-पदार्थ का अध्ययन त्वरक प्रयोगों की तरह ही बने हुए कण मन्दकों (decelerators) में किया जाता है क्योंकि जब कणों की उच्चा ऊर्जा पर टक्कर से इसका निर्माण करवाया जाता है तो उनको ट्रैप में लेने के लिए धीमा करना आवश्यक हो जाता है।
- यह भी सम्भव है कि न्यूट्रिनो (neutrino) मायोराना कण (Majorana particle) हैं। मायोराना फर्मी कण (अर्ध-पूर्णांक स्पिन वाले कण) उनको कहा जाता है जो स्वयं के प्रति-कण होते हैं। अर्थात आज तक यह ज्ञात नहीं है कि नूट्रिनो का प्रति-कण स्वयं न्यूट्रिनो है अथवा प्रति-न्यूट्रिनो अलग है।
- प्रति-पदार्थ को चिकित्सा विज्ञान में भी काम में लिया जाता है। इसका एक उदाहरण पॉज़िट्रान उत्सर्जन टोमोग्राफी है जिसमें पॉजिट्रॉन उत्सर्जित करने वाले समस्थानिक को ग्लूकोस में मिलाकर रक्त के साथ मिश्रित कर दिया जाता है। वहाँ पर जब पॉजिट्रॉन उत्सर्जित होता है तो वह किसी इलेक्ट्रॉन के साथ मिलकर उच्च ऊर्जा की गामा किरणे उत्सर्जित करता है और उनकी सहायता से बहुत उच्च गुणवत्ता का चित्र प्राप्त किया जा सकता है।सर्न स्थित ऐस प्रयोग में कैंसर के इलाज के लिए प्रयोग किये गए। उन्होंने सफलतापूर्वक प्रयोग किया लेकिन इंसानों पर उस प्रयोग के प्रभावों का अध्ययन अभी करना है।
- अंतरिक्ष में किये कुछ प्रयोगों से ज्ञात होता है कि अंतरिक्ष में ऐसा चुम्बकीय क्षेत्र उपस्थित है कि वो अंतरिक्ष किरणों (cosmic rays) की दिशा को परिवर्तित करता है। इससे यह परिणाम भी निकलता है कि सम्भवतः पदार्थ और प्रति-पदार्थ की मात्रा पुरे ब्रह्माण्ड में समान है जो ब्रह्माण्ड के चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से एक दूसरे के संपर्क में नहीं आ पाता।
- वैज्ञानिक इस बात पर भी विचार कर रहे हैं कि प्रति-पदार्थों को अंतरिक्षयानों में ईंधन के रूप में काम में लिया जाए। हालाँकि यह बहुत मुश्किल कार्य है क्योंकि प्रति-पदार्थों को किसी तरह से रखना आसान नहीं।

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