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| विल्हेम रॉन्टगन |
विल्हेम रॉन्टगन एक जर्मन वैज्ञानिक थे। उनका जन्म 27 मार्च 1845 को हुआ। उनके पिता जर्मन थे जबकि उनकी माँ डच थी। उनकी स्कूली शिक्षा उट्रेच (नीदरलैण्ड में एक स्थान) में हुई। वर्ष 1865 में उनके विद्यालय में किसी छात्र ने किसी शिक्षक का कार्टून बनाया लेकिन गलती से शिक्षक ने रॉन्टगन को विद्यालय से निष्काषित कर दिया। स्कूली शिक्षा पूर्ण करने से पहले रॉन्टगन को कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सकता था और वर्ष 1865 में उन्होंने उट्रेच विश्वविद्यालय (Utrecht University) में बिना आवश्यकतायें पूर्ण किये ही नियमित छात्र के रूप में शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्हें ज़्यूरिख (Zurich) स्विस फेडरल पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट (Eidgenössische Technische Hochschule अथवा ETH) में दाखिला लिया और यान्त्रिकी में अभियांत्रिकी (Engineering) की। वर्ष 1969 में उन्होंने ज़्यूरिख विश्वविद्यालय (Zurich University) से पीएचडी पूर्ण की जहाँ वो ऑगस्ट कुंड (August Kundt) के प्रिय शिष्य थे। ऑगस्ट कुंड ने ध्वनी तरंगों और प्रकाश के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध कार्य किया था। वर्ष 1874 में स्ट्रासबर्ग विश्वविद्यालय (Strassburg University) में रॉन्टगन व्याख्याता बने और बाद में अगले ही वर्ष होहेनहेम (Hohenheim) में एकेडमी ऑफ़ एग्रीकल्चर में प्रोफेसर बन गये। इसके बाद वो विभिन्न विश्वविद्यालयों में बुलाये जाते रहे और विभिन्न विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर के रूप में कार्य भी किया।
वर्ष 1895 में रोन्टगन निर्वात नलिकाओं पर कुछ बाहरी प्रभावों का अध्ययन कर रहे थे। इसी कड़ी में लेनार्ड नली के साथ प्रयोग कर रहे थे जिसमें कैथोड़ किरणों को अल्प मात्रा में बाहर भेजने के लिए एलुमिनियम की पन्नी लगायी गयी थी लेकिन उसको भी प्रबल विद्युत्-स्थैतिक (Electrostatic) बल से बचाने के लिए एक कार्डबोर्ड लगाया था। हालांकि उन्होंने पाया कि कार्डबोर्ड पर लगाये हुये बेरियम-प्लेटिनोसायनाइड (BaPt(CN)4) को ये अदृश्य किरणें चमकिला कर रही थी। इससे उन्होंने सोचा कि यह प्रयोग क्रूकेस-हिटोर्फ़ नली (Crookes–Hittorf tube) के साथ भी दोहराया जाना चाहिए। उन्होंने इसी वर्ष नवम्बर में अपने इस विचार पर प्रयोग किया। उन्होंने चमक को अच्छे से देखने के लिए क्रूकेस-हिटोर्फ़ नली को अच्छे से बन्द कर दिया जिससे किसी तरह का प्रकाश बाहर न आये। इसी तरह उन्होंने यह प्रयोग एकदम बन्द कमरे में दोहराया जिससे बाहरी प्रकाश भी अन्दर न आये। उन्होंने यह प्रयोग पहली बार शुक्रवार को किया था अतः अगले दो दिन सप्ताहान्त में (सामान्यतः यूरोपीय देशों में शनिवार और रविवार को छुट्टी मनाई जाती है) अपने प्रयोग को बार-बार दोहराया और हर तरह के प्रेक्षण लिये। उन्हें ज्ञात हुआ कि ये कुछ नयी तरह की किरणें हैं। उन्होंने अगले कई सप्ताह तक रात के समय प्रयोगशाला में सोते हुये इन प्रयोगों को दोहराया और इन नयी किरणों को एक्स-किरणें (X-rays) नाम दिया। यहाँ एक्स (X) उन्होंने बीजगणितीय अज्ञात प्राचल के रूप में प्रयुक्त एक्स के तौर पर दिया था। इन किरणों को बाद में रॉन्टगन के सम्मान में रॉन्टगन किरणें भी कहा गया लेकिन ज्यादा प्रचलित रूप एक्स-किरणें ही रहा। उनके इस कार्य के लिए उन्हें वर्ष 1901 का भौतिकी में नोबेल पुरस्कार दिया गया। यह नोबेल पुरस्कार की शुरूआत थी।
व्यक्तिगत जीवन में रॉन्टगन ने वर्ष 1872 में अन्ना बेर्था लुडविग के साथ विवाह किया। उन्होंने अन्ना के भाई के बेटे को दतक पुत्र के रूप में अपनी सन्तान के रूप में स्वीकार किया। उनकी पत्नी का वर्ष 1919 में निधन हो गया। रॉन्टगन का निधन वर्ष 1923 में आंत के कैंसर से हुआ। उनको विरासत में बहुत धन प्राप्त हुआ लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हुई मुद्रास्फिति के कारण वो अपने जीवन के अन्तिम दिनों में दिवालिया रहे और उनकी इच्छा के अनुरूप उनके निधन के पश्चात उनके सभी व्यक्तिगत और वैज्ञानिक पत्राचार जला दिये गये।

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