Monday, August 31, 2020

प्लांक का विकिरण नियम

    हमने क्वांटम यांत्रिकी के प्रथम ब्लॉग में चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में बात की और दूसरे ब्लॉग में कृष्णिका विकिरण से परिचय किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम क्वांटम यांत्रिकी के स्थान पर चिरसम्मत यांत्रिकी के ब्लॉग लिख रहे हैं। ये सब इसलिए आवश्यक है कि उस समय के वैज्ञानिक क्या कर रहे थे और उस समय क्या हो रहा था और अलग अलग वैज्ञानिक कौनसी समस्याओं पर उस समय काम कर रहे थे। ये सब इनके ऐतिहासिक महत्त्व को समझाता है। बिना इसके हम विषय का मूल्य और महत्त्व नहीं समझ सकते। आज का ब्लॉग प्लांक विकिरण नियम पर रहेगा।
    कार्य के आधार पर भौतिकी का विकास दो अलग अलग धाराओं में हुआ। अर्थात् भौतिकी को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं जिनमें एक सैद्धान्तिक भौतिकी है और अन्य प्रायोगिक भौतिकी। इसमें कई बार प्रायोगिक कार्य पहले कर लिया जाता है और बाद में उसे समझने के लिए सैद्धान्तिक विकास किया जाता है। ठीक इसी तरह कई बार सैद्धान्तिक भौतिकी किसी प्रयोग के सफल होने की प्रतीक्षा नहीं करती। सैद्धान्तिक भौतिकी का सबसे अच्छा और सफल उदाहरण लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के रूप में देखा जा सकता है जिसे हम महाप्रयोग भी कहते हैं, यह कण भौतिकी के मानक मॉडल पर आधारित है। यह सैद्धान्तिक उच्च ऊर्जा भौतिकी की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन क्वांटम यांत्रिकी का जो विकास हुआ है वो तात्कालिक प्रायोगिक परिणामों को पूर्ववत्ती सैद्धान्तिक भौतिकी द्वारा नहीं समझाने का परिणाम है। ऐसी अवस्था में भौतिक विज्ञानीयों को नये सिद्धान्त से भौतिकी को समझने का प्रयास करने का अवसर मिला। इसके परिणामस्वरूप क्वांटम यांत्रिकी का विकास हुआ और भौतिक विज्ञान में एक नये सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ।
    19वीं सदी के अन्त (उत्तरार्द्ध) में और 20वीं सदी के प्रारम्भ (पूर्वार्द्ध) में विश्व में विभिन्न प्रयोग किये गये जो सैद्धान्तिक समझ से उल्लिखीत नहीं हो सके। इसको ऐसे कह सकते हैं कि 20वीं सदी के प्रारम्भ के प्रयोगों की तात्कालीक रूप से सैद्धान्तिक व्याख्या उपलब्ध नहीं थी। उदाहरण के लिए कृष्णिका विकिरण वर्णक्रम, फोटो-इलेक्ट्रिक प्रभाव, कॉम्पटन प्रभाव, युग्म उत्पादन शामिल हैं। ये वो प्रयोग थे जो तात्कालीक सिद्धान्तों से नहीं समझाये जा सके। इनकी व्याख्या के लिए हमें नये सिद्धान्तों की आवश्यकता पड़ी जिसे हम क्वांटम यांत्रिकी के जन्म के रूप में देखते हैं।
    सबसे पहले हम कृष्णिका विकिरण के बारे में बात करते हैं। इसको समझने के लिए विकसित चिरसम्मत सिद्धान्तों को समझते हैं। ऐसा कहना गलत होगा कि वैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त को समझने का प्रयास नहीं किया। तात्कालिक रूप से वैज्ञानिकों ने इसको समझने के बहुत सफल प्रयास किये और उनके प्रयासों को उत्तरोत्तर क्रम में वैज्ञानिकों द्वारा नये सिद्धान्त को प्रतिपादित करने में काम में लिया गया। यहाँ पर सबसे पहले हम हम वीन विकिरण नियम का अध्ययन करेंगे। यह वही वीन है जिसका विस्थापन नियम पिछले ब्लॉग में समझाया गया है जिसमें हमने λmaxT = b लिखा था। वीन विकिरण नियम को वीन सन्निकटन नियम भी कहते हैं। इसका गणितीय सूत्र Eλdλ = Aλ-5e-a/λTdλ है जहाँ A और a नियतांक हैं और λ तरंगदैर्घ्य है। यह तरंगदैर्घ्य के फलन के रूप में वीन विकिरण नियम को निरूपित करता है और यह मैक्सवेल वोल्ट्समान सांख्यिकी पर आधारित है। यदि हम इस नियम को आवृत्ति के फलन के रूप में लिखने के लिए हमें c = νλ का प्रयोग करते हुये λ = c/ν ⇒ dλ = -(c/ν2)dν लिख सकते हैं। यहाँ पर हम कह सकते हैं कि dλ और dν में विपरित चिह्न हमें तरंगदैर्घ्य में वृद्धि को आवृत्ति में कमी को समझाता है। इससे हमें वीन विकिरण नियम Eνdν = A(ν3/c4)exp(bν/T) dν प्राप्त होता है। इस तरह से हमने ऊर्जा/तीव्रता को तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति के रूप में लिख दिया है। अब हम इसको कृष्णिका विकिरण के लिए समझें तो यह पूर्ण वर्णक्रम को समझाने में अक्षम रहा। यह केवल तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए सफल था लेकिन उच्च तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए यह नियम असफल रहा। जब हम इसको प्रायोगिक वक्र के साथ देखें तो यह तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए सुम्मेलित होता है लेकिन उच्च मानों पर यह असफल रहता है। इसी को हम यदि आवृत्ति के रूप में देखें तो यह उच्च आवृत्ति मानों के लिए सफल रहता है लेकिन निम्न आवृत्ति मानों के लिए पूर्णतः असफल रहता है।


दूसरा हम रेले-जीन्स विकिरण नियम का अध्यन करेंगे। लॉर्ड रेले और जेम्स जीन्स दो वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह नियम दिया। इस नियम को सामान्यतः रेले-जीन्स नियम भी कहते हैं। इनका नियम दो अभिगृहितों पर आधारित था। इनका पहला अभिगृहित यह था कि जो बतलाता है कि अप्रगामी विद्युत्चुम्बकीय तरंगे गुहा (कैविटी) के अन्दर सन्निहित होती हैं। उनका यह अभिगृहित विद्युत्चुम्बकीय सिद्धान्तों पर आधारित था अतः इसे हम विद्युत्चुम्बकीकी का सिद्धान्त कह सकते हैं। उनके दूसरे अभिगृहित के अनुसार उन्होंने किसी अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा की गणना के लिए समविभाजन प्रमेय को काम में लिया। यह दूसरा नियम उष्मागतिकी पर आधारित था। उन्होंने इसके लिए पिछले ब्लॉग में उल्लिखित अनुसार एक प्रायोगिक कृष्णिका की कैविटी को माना। हम पिछले ब्लॉग के अनुसार एक गोले को अन्दर से काला करके एक लघु छिद्र बनाकर उसे किसी निश्चित तापमान तक गर्म होने देते हैं। अब हम यह समझते हैं कि गुहा के अन्दर विद्युत्चुम्बकीय तरंगे कहाँ से आयी? अतः हम अपनी लघु छिद्र को किसी निश्चित ताप T पर अध्ययन करते हैं जब यह तापीय साम्य में है। इस तापमान पर इस गुहा में स्थित इलेक्ट्रॉन तापीय ऊर्जा के कारण यादृच्छिक आवृत्त गति करेंगे। चूँकि आवृत्त गति त्वरित गति होती है और उस अवस्था में कोई भी त्वरित आवेशित कण विद्युत्चुम्बकीय तरंगे उत्सर्जित करता है। अतः किसी निश्चित् तापमान पर हमें विद्युत्चुम्बकीय तरंगे मिलती हैं। हमने अप्रगामी तरंगों को क्यों माना? तो इसके लिए हम कह सकते हैं कि सतह पर विद्युत्चुम्बकीय तरंगों के नोड होंगे और कोई एंटीनोड नहीं होगा। नोड उन बिन्दुओं को कहते हैं जहाँ तरंग का विस्तापन शून्य होता है। इस तरह सतह के हर तरफ नोड बनेगा। चूँकि यदि यहाँ बनने वाली विद्युत्चुम्बकीय तरंगों से सम्बद्ध विद्युत् क्षेत्र सतह के समान्तर होता है और उस अवस्था में इलेक्ट्रॉनों की गति होगी और हमें विद्युत धारा प्राप्त होगी। अतः इस अवस्था से बचने का एक ही तरिका है कि यह विद्युत् क्षेत्र शून्य हो। अब सतह के हर ओर यदि नोड है तो यह ठीक उसी तरह का उदाहरण है जब हम एक रस्सी को दो तरफ से बांध दें। उस अवस्था में रस्सी में हमें केवल अप्रगामी तरंगे देखने को मिलेंगी। अतः पहला अभिगृहित अप्रगामी तरंगों के रूप में माना गया। अब हम दूसरे अभिगृहित को समझें, तो उसमें समविभाजन प्रमेय को माना गया है कि गुहा के अन्दर बनने वाली विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की कुल औसत ऊर्जा को समझ सकें। समविभाजन प्रमेय के अनुसार किसी अणु की इकाई स्वातंत्रय कोटि की  औसत गतिज ऊर्जा का मान kT/2 होती है। यह प्रत्येक अणु की प्रत्येक स्वतंत्र विधा की कुल औसत गतिज ऊर्जा kT/2 है। इसे सूत्र के रूप में हम Eav = 2×kT/2 = kT होगा। यहाँ पर सूत्र में kT/2 ऊर्जा का मान है और उसको 2 से इसलिए गुणा किया गया है क्योंकि जब भी हम सरल आवृत्त गति का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि कुल औसत ऊर्जा का मान कुल औसत गतिज ऊर्जा से दो गुणा होता है। अतः यहाँ Eav कुल औसत ऊर्जा को निरूपित करता है। अतः यहाँ पर प्रत्येक अप्रगामी तरंग की औसत ऊर्जा kT होती है। अतः अब हम रेले-जीन्स के नियम का प्रतिपादन का प्रयास करते हैं।

सबसे पहले हम अप्रगामी तरंगों का गुहा के अन्दर घनत्व को समझते हैं। यदि इसे हम N(ν)dν लिखें तो हमें N(ν)dν = (8πν2/c3)dν प्राप्त होती है। यह एक महत्त्वपूर्ण व्युत्त्पति है जो आप किसी भी पाठ्य पुस्तक में देख सकते हैं। हमारा सुझाव यह रहेगा कि आपको इसे व्युत्पन्न करना चाहिए। अब हम दूसरे नियम के अनुसार देखें तो प्रत्येक अप्रगामी तरंग के अनुसार कुल औसत ऊर्जा Eav = kT लिखते हैं। अतः गुहा के अन्दर ऊर्जा घनत्व का मान गुहा में अप्रगामी तरंगों का घनत्व और एक अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा के गुणनफल के बराबर होगी। अतः सूत्रिय रूप में uνdν = (8πν2/c3) dν × kT = (8πν2kT/c3)dν लिख सकते हैं। यह आवृत्ति के रूप में हमें रेले-जीन्स का नियम प्राप्त होता है। चूँकि c = νλ अतः dν = -(c/λ2)dλ और uλdλ = (8πkT/λ4)dλ प्राप्त होता है जिसे हम रेले-जीन्स विकिरण नियम का तरंगदैर्घ्य के रूप में सूत्र कह सकते हैं।

जैसे हमने वीन विकिरण नियम में देखा ठीक उसी तरह यदि रेले-जीन्स के लिए भी वर्णक्रम से तुलना करें तो ज्ञात होता है कि रेले जीन्स नियम उच्च तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए सत्य प्राप्त होता है लेकिन तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए यह सुम्मेलित नहीं होता और प्रायोगिक मानों को समझाने में अक्षम रहता है। अतः उच्च तरंगदैर्घ्य मानों के लिए यह प्रायोगिक मानों को समझाने में सफल रहता है। ठीक इसी तरह यदि इसे आवृत्ति के रूप में देखें तो रेले जीन्स का नियम निम्न आवृत्ति मानों के लिए वर्णक्रम के तुल्य पाया जाता है लेकिन उच्च आवृत्ति मानों के लिए रेले जीन्स का नियम असफल रहता है। इस तरह से हम पाते हैं कि चिरसम्मत यांत्रिकी यहाँ पर असफल रहती है और कृष्णिका विकिरण को समझाने में असफल रहती है। इस असफलता को एक विशिष्ठ नाम दिया गया जिसे हम पराबैंगनी विपद भी कहते हैं।

चिरसम्मत यांत्रिकी की असफलता को हम पराबैंगनी विपद के नाम से जानते हैं जिसे अंग्रेज़ी में अल्ट्रावॉयलेट कैटास्ट्रोप कहा जाता है। यहाँ पर हम पराबैंगनी विपद क्यों कहते हैं? यह समझने के लिए हम कृष्णिका विकिरण वर्णक्रम को देखें तो ज्ञात होता है कि अधिकतम तीव्रता से कम तरंगदैर्घ्य वालों के निकट हमें दृश्य क्षेत्र प्राप्त होता है, उससे अधिक तरंगदैर्घ्य के लिए हमें अवरक्त क्षेत्र और उससे कम तरंगदैर्घ्य के लिए हम पराबैंगनी तरंग क्षेत्र कहते हैं। लेकिन उपरोक्त विवेचना के अनुसार जब हम दृश्य क्षेत्र से पराबैंगनी क्षेत्र में जाते हैं तो रेले-जीन्स नियम असफल हो जाता है अतः इसे हम पराबैंगनी विपद कहते हैं। यहाँ पर हम दो अन्य बिन्दू देखते हैं। सूत्र में हमें uν ∝ ν2 प्राप्त होता है तथा किसी अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा kT प्राप्त होती है। इसके अनुसार गुहा में स्थित इलेक्ट्रॉनों के तापीय उत्सर्जन के दौरान उनकी आवृत्ति क्या सम्भव है? इन इलेक्ट्रॉनों की आवृत्ति बहुत कम से बहुत अधिक तक कुछ भी सम्भव है। अर्थात् इलेक्ट्रॉन लघु से दीर्घ और मध्यम मान की कोई भी आवृत्ति रख सकता है और यह सतत हो सकती है। अतः जब इलेक्ट्रॉन विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को कोई भी आवृत्ति दे सकता है। चिरसम्मत यांत्रिकी के अनुसार यह कोई भी सतत ऊर्जा विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को दे सकता है और चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार यह ऊर्जा स्थानान्तरण को सतत भी रख सकता है। इसके अतिरिक्त सभी अलग अलग आवृत्ति की अप्रगामी तरंगों की कुल औसत ऊर्जा kT होगी क्योंकि अलग-अलग आवृत्ति के इलेक्ट्रॉन गुहा में अलग-अलग आवृत्ति की विद्युत्चुम्बकीय तरंगे उत्पन्न करते हैं और वो अलग-अलग विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की औसत ऊर्जा समान रूप से kT है। हमने जो दो बिन्दू चिरसम्मत भौतिकी के लिए लिखा है, वो दोनों गलत हैं। इसी तरह uν ∝ ν2  से भी हम समझ सकते हैं कि आवृत्ति के बढ़ने पर ऊर्जा घनत्व भी बहुत अधिक बढ़ना चाहिए लेकिन किसी भी तापमान पर तापीय विकिरणों का घनत्व अनन्त की ओर अग्रसर नहीं हो सकता और यह परिणाम भी असम्भव था। इसी को हमने पराबैंगनी विपद नाम दिया है।

अब हम चिरसम्मत यांत्रिकी के अच्छे प्रयासों का अध्ययन कर चुके हैं और हमने पाया कि पूर्ण वर्णक्रम को कोई भी चिरसम्मत नियम समझाने में असफल रहा अतः प्लांक नियम को समझेंगे। मैक्स प्लांक जर्मन भौतिक विज्ञानी थे और कहा जाता है कि वो विद्युत् बल्ब की दक्षता बढ़ाने के लिए काम कर रहे थे। आजकल बल्ब का प्रयोग बहुत सीमित हो गया है लेकिन कुछ वर्ष पूर्व तक काम में लिया जाने वाला बल्ब कृष्णिका के रूप में विकिरण उत्सर्जन करता है और इसका बहुत छोटा भाग दृश्य क्षेत्र में आता है। आजकल प्रयुक्त एलईडी बल्ब और सीऍफ़एल का सिद्धान्त अलग है लेकिन सामान्य बल्ब उच्च ऊर्जा पर गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित करता था और हमें दृश्य प्रकाश देता था। जब बल्ब उच्च तापमान पर गर्म होता है तब उसके तन्तु का तापमान लगभग 3000 केल्विन होता है। अर्थात् पूर्ण तापमान पर यह बल्ब बहुत अधिक मात्रा में गर्म होता था और फिर भी हमें बहुत कम तीव्रता के साथ प्रकाश उपलब्ध होता था। इसको हम कृष्णिका वर्णक्रम से समझ सकते हैं। उसमें हमें दृश्य क्षेत्र में बहुत कम क्षेत्र प्राप्त होता है और ऊर्जा का अधिकतर भाग बेकार जाता था जो हमें दृश्य प्रकाश नहीं देता। अतः इसकी दक्षता बढ़ाने के लिए दृश्य प्रकाश के क्षेत्र को बढ़ाना आवश्यक था। ऐसा कहा जाता है कि प्लांक को कुछ शोध प्रणेताओं ने इसकी दक्षता बढ़ाने का कार्य दिया। इसके लिए प्लांक ने सबसे पहले कृष्णिका विकिरण के मूल सिद्धान्त को समझने का प्रयास किया। प्लांक ने इस तरह से इस समझ को विकसित किया कि दुनिया ही बदल दी। जो चिरसम्मत भौतिकी हमें सम्पूर्ण लगती थी उसका पहली असफलता वैज्ञानिकों के सामने आया। सबसे पहले प्लांक ने क्या किया। इसका अर्थ यह नहीं कि चिरसम्मत भौतिकी की यह सफलता भौतिकी के विकास में कोई योगदान नहीं, ऐसा बिलकुल गलत होगा। भौतिकी के विकास में चिरसम्मत भौतिकी का बहुत बड़ा योगदान रहा है, जरूरी नहीं कि हर वैज्ञानिक का सफल प्रयोग ही हमारे काम में आये, बल्कि असफल प्रयोग भी आगे के प्रयोग विकसित करने में सहायक होस सकता है। प्लांक ने सबसे पहले रेले-जीन्स विकिरण नियम में कमीयों को समझने का प्रयास किया। जैसा कि हम उपर देख चुके हैं ऊर्जा घनत्व का मान गुहा में अप्रगामी तरंगों के घनत्व और किसी अप्रगामी तरंग की औसत ऊर्जा के गुणनफल के तुल्य है। प्लांक के अनुसार अप्रगामी तरंगों के घनत्व में कोई समस्या नहीं है लेकिन उनकी कुल औसत ऊर्जा की गणना में एक बड़ी समस्या है। प्लांक के अनुसार गुहा में स्थित अलग अलग आवृत्ति की अप्रगामी तरंगों की ऊर्जा समान कैसे हो सकती है? इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रेक्षित किया कि कुल औसत ऊर्जा का सूत्र Eav = kT भी कुछ अशुद्धता रखता है। क्योंकि उन्होंने पाया कि निम्न ऊर्जा मानों के लिए रेले-जीन्स का नियम सही है लेकिन उसके साथ समस्या अधिक आवृत्ति मानों के लिए गलती है। अतः उन्होंने पाया कि औसत ऊर्जा का मान निम्न आवृत्ति के मानों के लिए kT को अग्रसर होना चाहिए लेकिन उच्च आवृत्ति मानों के लिए यह शून्य की और अग्रसर होना चाहिए। अतः औसत ऊर्जा को आवृत्ति का फलन होना चाहिए। अर्थात् Eav = f(ν) होना चाहिए। जबकि पहले के अनुमान में यह मान kT के रूप में नियत था जो आवृत्ति पर निर्भर नहीं था। प्लांक ने इसके अतिरिक्त पाया कि जो दोलित्र (यहाँ पर इलेक्ट्रॉन) भिन्न भिन्न आवृत्ति से दोलन कर रहे हैं और लेकिन विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को सतत ऊर्जा दे रहे हैं जो सम्भव नहीं है। यदि हमें ऐसा कोई सिद्धान्त प्रतिपादित करना है जो प्रायोगिक वर्णक्रम को समझा सके, उसके लिए आवश्यक है कि दोलित्र से विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को ऊर्जा का आदान प्रदान विविक्त होना चाहिए और यह सतत नहीं होना चाहिए अर्थात् यह क्वांटिकृत होना चाहिए और इसके लिए हम प्लांक क्वांटीकरण नियम का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार ऊर्जा का मान 0, ΔE, 2ΔE, 3ΔE ... के रूप में होना चाहिये। यह चिरसम्मत यांत्रिकी से एकदम भिन्न है जिसके अनुसार किसी भी ऊर्जा की विद्युत्चुम्बकीय तरंग प्राप्त हो सकती है। लेकिन यहाँ पर ऊर्जा के सतत मान नहीं हैं और यह टुकड़ों के रूप में स्थानान्तरित हो रही है। अर्थात् यह मान या तो ΔE होगी, या फिर ये 2ΔE होगी या फिर ये 3ΔE स्थानान्तरित होगी। यहाँ पर निम्नतम ऊर्जा ΔE का मान आवृत्ति ν के अनुक्रमानुपाती होती है और इसे हम ΔE = hν लिख सकते हैं। यहाँ पर यह h प्लांक नियतांक के रूप में जाना जाता है। प्लांक ने अपने सैदान्तिक अध्ययन से h का मान भी प्रेक्षित किया। उन्होंने प्रायोगिक परिणामों को सुम्मेलित करने का प्रयास करते हुये इस नियतांक का मान ज्ञात किया। ये परिणाम प्लांक ने असफल सिद्धान्तों को पढ़कर ये परिणाम निकाले। अतः विज्ञान के विद्यार्थी होने के नाते आपको असफलता और सफलता को अलग अलग नहीं देखना चाहिए। ये केवल प्रयोग होते हैं और ये असफल प्रयोग भी प्लांक के प्रयोग को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रखता है यह हमें ध्यान रखना चाहिए।

अब हम प्लांक के विकिरण नियम का अध्ययन करेंगे। उपरोक्त नियम प्लांक का क्वांटीकरण नियम था। प्लांक के क्वांटिकरण नियम के अनुसार E = 0, ΔE, 2ΔE, 3ΔE, ... जहाँ Δ ν है जिसे हम ΔE = hν लिख सकते हैं जहाँ h प्लांक नियतांक है और हम E = nhν लिख सकते हैं। यहाँ n कोई पूर्णांक संख्या है। अब यहाँ से हम प्लांक के क्वांटिकरण को इस सूत्र से दे सकते हैं। प्लांक नियतांक का मान 6.62×10-34 जूल-सैकण्ड होती है। यह एक सार्वत्रिक नियतांक है जिसका एसआई मात्रक जूल-सैकण्ड है। अब इसके आधार पर प्लांक ने E = nhν से अप्रगामी तरंगों के लिए एक तरंग की कुल औसत ऊर्जा ज्ञात की जिसका सूत्र Eav = hν/(exp(hν/kT) - 1 ) प्राप्त किया। यह दूसरी उत्पत्ति है जो हमने आपके लिए छोड़ी है। यह आप किसी भी स्नातक स्तर की पाठ्य पुस्तक में पा सकते हैं। यह एक बहुत ही सुन्दर व्यंजक है और आपको इसे हल करना चाहिए। चूँकि यहाँ E के मान किसी दोलित्र के लिए hν है, किसी के लिए 2hν तो किसी के लिए 3hν और किसी के लिए nhν है। इन सभी का औसत मान उपरोक्त सूत्र में लिखे अनुसार प्राप्त होता है। अतः औसत ऊर्जा के सूत्र से इसे ज्ञात किया जा सकता है। अब हम इस ऊर्जा सूत्र को रेले जीन्स के नियम में रखकर देखते हैं। अब तक हमने प्लांक का क्वांटिकरण नियम देखा। अब हम प्लांक के विकिरण नियम का अध्ययन करते हैं जिसे अंग्रेज़ी में प्लाक्ज़ रेडियेशन लॉ कहते हैं। पुनः हम गुहा में ऊर्जा घनत्व को गुहा में अप्रगामी तरंगों के घनत्व और एक अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा के गुणनफल के रूप में लिखते हैं तो हमें सूत्र uν = (8πν2/c3)(hν/(exp(hν/kT)-1) लिख सकते हैं जिसमें प्रथम पद रेले जीन्स नियम से सीधा उधार लिया है लेकिन यहाँ दूसरे पद में रेले जीन्स की ऊर्जा kT के स्थान पर प्लांक क्वांटिकरण नियम से ली गयी है। अतः परिणामी सूत्र हमें uν = (8πhν3/[c3(exp(hν/kT)-1))] प्राप्त होता है। आप इस सूत्र को तरंगदैर्घ्य के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। यह आपके लिए गृह कार्य है, आप इसे तरंगदैर्घ्य के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं जिसमें आवृत्ति के पदों में प्लांक के विकिरण नियम को तरंगदैर्घ्य के पदों में प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए आपको तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में सम्बन्ध को याद रखना पड़ेगा। अब यहाँ देखा जा सकता है कि यह नियम आश्चर्यजनक रूप से एक ऐसा सैद्धान्तिक नियम है जो कृष्णिका विकिरण के पूर्ण प्रायोगिक वर्णक्रम को समझाने में सफल रहता है। इसके लिए आप निम्नलिखित ग्राफ़ देख सकते हैं:


यहाँ उपरोक्त चित्र में प्लांक विकिरण नियम और प्रायोगिक वर्णक्रम एक दूसरे को पूर्णतः अतिव्यापी करते हैं। यह नियम वीन के नियम और रेले-जीन्स के नियम की तरह उच्च आवृत्ति अथवा निम्न आवृत्ति को समझाने वाले नहीं है बल्कि यह पूर्ण वर्णक्रम को पूर्णतः समझाने में सफल रहा। प्लांक के इस नियम की सफलता के साथ ही इसने भौतिकी में क्वांटम यांत्रिकी के रूप में नया पथ प्रदर्शित करने किया और न्यूनतम ऊर्जा के टुकड़ों के रूप में ऊर्जा के क्वांटा से ही हमें ज्ञात हुआ कि ऊर्जा का स्थानान्तरण सतत न होकर विविक्त होता है जैसा हमने दोलित्र से विद्युत्चुम्बकीय तरंग में स्थानान्तरण के रूप में देखा। प्लांक का यह कार्य इतना अधिक महत्त्वपूर्ण था कि मैक्स प्लांक को 1918 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मैक्स प्लांक जर्मनी से थे अतः जर्मनी में प्लांक के नाम पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण शोध संस्थान है जिसका नाम प्लांक रिसर्च सोसाइटी है। प्लांक इस नये सिद्धान्त के प्रथम अन्वेषक हैं। वो इस सिद्धान्त के पितामह भी कहे जा सकते हैं।


अब आगे हम कुछ और चर्चा करते हैं जो आपके गृह कार्य से सम्बंधित है। हम प्लांक विकिरण नियम की चर्चा करते हैं। 

  1. प्लांक के विकिरण नियम की सहायता से निम्न तरंगदैर्घ्य क्षेत्र में वीन के नियम को व्युत्पन्न कीजिए। यह कार्य उपर किया जा चुका है जिसमें कहा गया था कि औसत ऊर्जा निम्न ऊर्जा क्षेत्र में kT और उच्च ऊर्जा क्षेत्र में शून्य होनी चाहिए।
  2. प्लांक के विकिरण नियम की सहायता से उच्च तरंगदैर्घ्य क्षेत्र में रेले-जीन्स नियम को व्युत्पन्न कीजिए। 

ये दो प्रश्न आपके गृह कार्य में हैं इससे पहले हमने आपको दो सूत्र व्युत्पन्न करने के लिए दिये हैं जिसमें अप्रगामी तरंगों के लिए ऊर्जा घनत्व का मान ज्ञात करना और प्लांक दोलित्र के लिए औसत ऊर्जा ज्ञात करना शामिल है। इसप्रकार आपके लिए चार प्रश्न गृह कार्य के रूप में छोड़े हैं।

उपरोक्त विषय की वीडियो के रूप में व्याख्या के लिए निम्नलिखित वीडियो देखें:




Sunday, August 30, 2020

कृष्णिका विकिरण

पिछले ब्लॉग में हमने चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में अध्ययन किया और इस ब्लॉग में हम कृष्णिका विकिरण के बारे में लिख रहे हैं। 

कृष्णिका विकिरण तापीय विकिरण होते हैं। किसी वस्तु के स्वयं के तापमान के कारण उत्सर्जित होने वाली विकिरणों को हम तापीय विकिरण कहते हैं। कृष्णिका विकिरण भी एक तरह की तापीय विकिरण ही होती हैं। इसके बारे में वर्ष 1792 में ब्रितानी वेजवूड पोर्सेलिन निर्माता थॉमस वेजवूड ने दिया था। उन्होंने अपने चुल्हे में यह प्रेक्षित किया था कि वो जिस वस्तु को भी गर्म करते हैं वो लाल रंग की हो जाती है। उनके द्वारा दिये गये नियम के अनुसार सभी वस्तुयें सभी तापमानों पर तापीय विकिरणों का उत्सर्जन करती हैं। अर्थात् मैं (लिखने वाला) और आप (पाठक) भी इस समय विकिरणों का उत्सर्जन कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे आसपास की सभी वस्तुयें तापीय विकिरणों को उत्सर्जित कर रही हैं। हमें सभी तापीय विकिरणें दिखाई नहीं देती और जो हमें दिखाई देती हैं उनका तरंगदैर्घ्य लगभग 4000 Å से 7000 Å तक होता है जिसे दृश्य प्रकाश कहा जाता है। सामान्य ताप पर किसी भी वस्तु से उत्सर्जित तरंगों का न्यूनतम तरंगदैर्घ्य लगभग 9500 Å होता है जो अवरक्त क्षेत्र से सम्बंधित होती हैं। यदि हम किसी वस्तु का तापमान बढ़ाते हैं और यह तापमान 1100 K (केल्विन) तक लेकर जाते हैं तो वह वस्तु लाल दिखाई देने लगती है। जब यह तापमान लगभग 3000 K के लगभग हो जाता है तो यह श्वेत-पीली रंग की दिखाई देने लगती है। उदाहरण के लिए आपने लुहार को लौहे को गर्म करते देखा होगा।

कृष्णिका उस वस्तु को कहते हैं जो इसपर गिरने वाले सभी तरह की विकिरणों को अवशोषित करने में सक्षम हो। अर्थात् अवशोषण में विकिरण के तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति अथवा आगमन के कोण पर निर्भरता नहीं होती। यह एक तरह से ऐसी विशिष्ट वस्तु होती है जिसपर गिरने वाली विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है और इसका किसी तरह का परावर्तन नहीं होता। यदि किसी सामान्य वस्तु पर कोई कोई विकिरण आपतित होती है तो सम्भावित घटानाओं में परावर्तन, अवशोषण और पारगमन (इसमें अपवर्तन भी) शामिल है। यदि इन तीनों की प्रायिकता क्रमश r, a और t हो तो r + a + t = 1 प्राप्त होगा क्योंकि कुल प्रायिकता एकांक ली जाती है। यदि हम कृष्णिका की बात करें तो केवल अवशोषण की बात करते हैं अर्थात् r = 0 और  t = 0 है अतः a = 1 प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कृष्णिका विकिरण के लिए हम एक अन्य नियम की चर्चा करते हैं जिसे किरचॉफ़ का नियम कहते हैं जिसके अनुसार अच्छे अवशोषक अच्छे उत्सर्जक होते हैं। अर्थात् eλ/aλ नियत होता है जहाँ eλ उत्सर्जन क्षमता और aλ  अवशोषण क्षमता को निरूपित करते हैं। तापीय साम्य अवस्था पर कृष्णिका के लिए eλ का मान इकाई होता है अतः उपरोक्त नियम के अनुसार aλ का मान भी इकाई होगा। इस तरह से हम समझ सकते हैं कि कृष्णिका को हम यह नाम क्यों देते हैं। चूँकि सामान्य तापमान पर हम किसी वस्तु को देखने के लिए उससे परावर्तित विकिरणों से देखते हैं लेकिन कृष्णिका किसी भी ताप पर किसी तरह का परावर्तन नहीं करती और अतः हम इसे कृष्णिका कहते हैं। कमरे के ताप पर यह काले रंग की दिखाई देती है लेकिन सभी तापमानों पर इसका काला दिखाई देना आवश्यक नहीं है जिसके सामान्य उदाहरणों में सूर्य और सामान्य बल्ब हैं जो तापीय नियम से हमें रोशनी देते हैं।

एक प्रायोगिक कृष्णिका का निर्माण करने के लिए हम एक खोखला गोला लेते हैं जिसके किसी एक स्थान पर एक छोटा सा छिद्र कर देते हैं। इस छिद्र का आकार गोले की तुलना में नगण्य है। गोले को आन्तरिक भाग को काले रंग कर दिया जाता है। चूँकि काले रंग को अच्छा अवशोषक माना जाता है। अब यदि कोई विकिरन उस छिद्र पर आपतित होगी तो वो गोले के अन्दर चली जायेगी जिससे गोले के अन्दर उस विकिरण के कुछ परावर्तन होंगे। चूँकि गोले के आन्तरिक भाग को काला किया गया है अतः परावर्तन की मात्रा बहुत कम होगी और उत्तरोत्तर प्रावर्तनों के पश्चात् विकिरण अवशोषित हो जाती है। गोले पर बने छिद्र को बाहर से देखने पर ज्ञात होता है कि उससे टकराने वाले विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है अतः यह छिद्र कृष्णिका का काम करता है। ध्यान रहे पूरा गोला कृष्णिका नहीं है और उसपर आपतित किरणें परावर्तन भी प्रदर्शित करता है। अतः यहाँ कृष्णिका के रूप में केवल गोले पर बने छिद्र को कहा जाता है।


यदि हम कृष्णिका का अध्यन किसी वर्णक्रममापी के साथ किसी एक निश्चित तापमान पर करें तो हमें ज्ञात होगा कि इससे उत्सर्जित विकिरणों की तीव्रता का एक निश्चित वर्णक्रम होगा जो तरंगदैर्घ्य में वृद्धि के साथ पहले शिथिलतः बढ़ता है और एक निश्चित मान के बाद वो पुनः कम होने लग जाता है जो अनन्त तरंगदैर्घ्य पर शून्य की तरफ अग्रसर होता है। किसी अन्य तापमान (जो पहले वाले से अधिक है) पर भी यह कुछ इसी तरह का होता है लेकिन इसके अधिकतम तीव्रता का मान बढ़ जाता है जो कम तरंगदैर्घ्य पर दिखाई देता है। यह वर्णक्रम कृष्णिका के पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। यह वर्णक्रम का आरेख सतत होता है जो यह प्रदर्शित करता है कि हमें सभी तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए वर्णक्रम प्राप्त होता है। यहाँ तीव्रता के अधिकतम मान पर स्थित तरंगदैर्घ्य और तापमान में एक निश्चित सम्बन्ध होता है। यह तरंगदैर्घ्य का मान तापमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात λmaxT = b होता है जहाँ b वीन नियतांक है। इस नियम को वीन विस्थापन नियम कहते हैं। इसी तरह कुल उत्सर्जन क्षमता मान ताप की चतुर्थ घात के समानुपाती होती है जिसे स्टीफन वोल्ट्समान का नियम कहते हैं।


उपरोक्त नियमों को एक साथ निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है:

  1. कृष्णिका विकिरण का मान केवल तापमान पर निर्भर करता है।
  2. कृष्णिका विकिरण का आरेख सतत होता है।
  3. कृष्णिका विकिरण की तीव्रता का मान शून्य तरंगदैर्घ्य से आरम्भ होती है और तरंगदैर्घ्य का मान बढ़ने के साथ बढ़ती है। एक निश्चित तरंगदैर्घ्य पर यह अधिकतम पर पहुँचने के पश्चात् पुनः कम होने लग जाता है।
  4. अधिकतम तीव्रता की स्थिति में इससे उत्सर्जित ऊर्जा का मान तापमान की पंचम घात के समानुपाती होती है।
  5. कुल उत्सर्जन क्षमता उपरोक्त के समाकलन से ज्ञात होती है जो तापमान के चतुर्थ घात के समानुपाती होती है।

अधिक दृश्य प्रभावों के साथ इसे देखने के लिए निम्नलिखित विडियों को देखा जा सकता है:



Tuesday, August 25, 2020

क्वांटक यांत्रिकी: चिरसम्मत भौतिकी का एक परिचय

क्वांटम यांत्रिकी आज चिकित्सा से लेकर अभियांत्रिकी के सभी विषयों में प्रयुक्त होती है। हमें क्वांटम यांत्रिकी को समझने से पहले यह समझना चाहिए कि हमें इसकी जरूरत क्यों पड़ी और उसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि हम चिरसम्मत यांत्रिकी को समझें। अतः यह ब्लॉग चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में चर्चा के लिए लिखा गया है।

चिरसम्मत भौतिकी को हम तीन भागों में विभक्त करते हैं: 

  1. चिरसम्मत यांत्रिकी,
  2. चिरसम्मत विद्युत्गतिकी और
  3. उष्मागतिकी
सबसे पहले हम इसके सभी नियमों को समझने का प्रयास करते हैं:

  1. चिरसम्मत यांत्रिकी की शुरूआत हम न्यूटन की गति के नियमों से आरम्भ करते हैं जिसमें बाद में लाग्रांजियन और हैमल्टोनियन को शामिल कर लेते हैं जो हमें ज्यादा अच्छे से सूत्रित करके समस्याओं को हल करने में सहायता प्रदान करते हैं। इसमें हम कण अथवा वस्तु की गति, दृढ़ पिंड, बल, बलाघूण, जड़त्व के नियम आदि का अध्यन करते हैं। 
  2. विद्युत्गतिकी को हम मैक्सवेल समीकरणों से उल्लिखित करते हैं। मूलतः हम चार मैक्सवेल समीकरणों का अध्ययन करते हैं जो हमें कणों की गति, विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र और उनकी अन्योन्य क्रियायें और इन क्षेत्रों का दिक्-काल में परिवर्तन।
  3. उष्मागतिकीय नियम और मैक्सवेल वोल्ट्समान सांख्यिकी इसको समझाने के लिए काम में लिए जाते हैं। इसमें हम उष्मा, कार्य और किसी निकाय के औसत व्यवहार का अध्ययन करते हैं। यहाँ निकाय को हम कणों के समाहार के रूप में देखते हैं।
चिरसम्मत भौतिकी एक निश्चियात्मक सिद्धान्त है जबकि क्वांटम यांत्रिकी एक प्रायिकता आधारित सिद्धान्त है। हम इस वाक्य को सरल शब्दों में एक उदाहारण देकर समझा सकते हैं। जैसे हम एक कण को समझने का प्रयास करते हैं जिसकी प्रारम्भिक अवस्थायें हमें ज्ञात हैं जिनमें कण का द्रव्यमान, उसकी प्रारम्भिक अवस्था r = r0, प्रारम्भिक वेग v = u और इस कण पर कार्य करने वाले बल F = F0 शामिल हैं। अर्थात हमें कण की सभी प्रारम्भिक अवस्थाओं का ज्ञान है। अतः हम न्यूटन की गति के नियम अथवा लाग्रांजियन अथवा हैमल्टोनियन की सहायता से इस कण के भविष्य को सुपरिषित कर सकते हैं और इसकी भविष्य में स्थिति को यथार्थता के साथ बताना सम्भव है जिसे गणितीय रूप में कण का बिन्दुपथ कहते हैं। अतः चिरसम्मत यांत्रिकी में हमें यदि प्रारम्भिक अवस्थायें ज्ञात हों तो हम भविष्य को जान सकते हैं। चिरसम्मत यांत्रिकी के अनुसार कण और तरंग दो एकदम अलग रूप में मानती है अर्थात् कोई कण कभी तरंग नहीं हो सकता और कोई तरंग कभी कण नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए हम इन्हें दो ऐसे समुच्चय मान सकते हैं जिनके अन्तर्वेशित अथवा प्रतिच्छेदन समुच्चय के रूप में केवल खाली समुच्चय दिया जा सकता है। हम कण और तरंगों में कुछ अन्तर को समझने का प्रयास करते हैं:
  1. कण के पास द्रव्यमान, ऊर्जा और संवेग होता है जबकि तरंग के पास केवल ऊर्जा और संवेग होता है।
  2. कण केवल टक्कर कर सकते हैं लेकिन तरंगे व्यतिकरण, विवर्तन, परावर्तन अथवा अपवर्तन कर सकती हैं।
अर्थात कण कभी व्यतिकरण की घटना नहीं दिखायेंगे वैसे ही तरंगों के मध्य टक्कर नहीं होंगी। इस तरह से जो घटनायें कण और तरंग के लिए हैं वो अलग अलग हैं।

उपरोक्त विषय को दृश्य प्रभावों और प्रभावी रूप में समझने के लिए कृपया निम्नलिखित वीडियो देखें: https://youtu.be/tun5TKXSe0M


Thursday, June 18, 2020

NISER (NATIONAL INSTITUTE OF SCIENCE EDUCATION & RESEARCH)

Motive behind establishing NISER 

To provide quality collegiate education in basic sciences coupled with cutting-edge research at the undergraduate level.

Goal of NISER

A Primary objective of the institute is to train and nurture human resources in the Sciences for the knowledge economics of the future. 

Location -

Bhubaneswar, Odisha, India


Nature -

A premier fully residential Public institution under the umbrella of Department of Atomic Energy (DAE), Govt. of India. This institute is a constituent institution of Homi Bhabha National institute (HBNI).

Admission Procedure 

A) For Integrated MSc Program: After 12th - 
Duration of Program - 5 Years (UG + PG)
Students get selected for integrated M.Sc. programs through a competitive annual examination, the National Entrance Screening Test (NEST)

B) For integrated PhD (i- PhD) courses: After UG (Under Graduation) -

The admission is based on IIT-JAM / JEST score. The shortlisted candidates are then called for an interview process on basis of which the seats are allotted to the candidates.

C) For PhD courses: After PG (Post Graduation) - 


To get admission, students have to qualify the - NET (CSIR/UGC) / GATE / NBHM or equivalent examination valid for the current year in the relevant area of research.

    Friday, June 12, 2020

    IISERs (INDIAN INSTITUTES OF SCIENCE EDUCATION & RESEARCH)


    Motive behind establishing IISERs

    To integrate and promote interdisciplinary science education and research.


    Goal of IISERs

    Enable students to shape the nation by inventing and implementing sustainable solutions for societal problems through research in science.



    Total number of IISERs - Seven (7)


    Locations
          (1) Berhampur (Odisha)
          (2) Bhopal (Madhya Pradesh)
          (3) Kolkata (West Bengal)
          (4) Mohali (Punjab)
          (5) Pune (Maharashtra)
          (6) Thiruvanathapuram 
               (Kerala)
          (7) Tirupati (Andhra Pradesh)

    Nature - Public institutions (Govt.of India funded)


    Admission Procedure

    A) For UG courses: After 12th - 

    For UG (Under Graduate) courses candidates are admitted to IISER's BS-MS Programme through below-mentioned three channels:
    1. KVPY (Kishore Vaigyanik Protsahan Yojana)
    2. JEE (Advanced) 
    3. SCB (State and Central Board) 

    B) For integrated PhD (i- PhD) courses: After UG (Under Graduation) -

    The admission is based on IIT-JAM / JEST score. The shortlisted candidates are then called for an interview process on basis of which the seats are allotted to the candidates.

    C) For PhD courses: After PG (Post Graduation) - 

    Candidates seeking admission to the PhD programme need to have a valid score in specialisation-specific entrance exams like CSIR-UGC-JRF/ GATE/ INSPIRE PhD/ JEST etc. along with a good academic record. The shortlisted candidates are called for a screening test and an interview round basis which the seats are allotted to the applicants.



      Sunday, June 7, 2020

      The goal of Universities


      The goal of Universities



               
                 A university stands for humanism, for tolerence, for reason, for progress, for the adventure of the ideas and for the search of truth. It stands for the onward march of human race towards even higher objectives. If the universities discharge their duty adequately, then it is well with the nation and the people. But if the temple of learning itself become a home of narrow bigotry and petty objectives, how then will the nation prosper or a people grow in stature? 
                A wast responsibility, therfore, rests on our universities and educational institutions and those who guide their destinies. They have to keep their lights burning and must not stray from the right path even when passion convulses the multitude and blinds many amongst those whose duty it is to set an example to others. We are not going to reach our goal through crookedness or flirting with evil in the hope that it may lead to good. The right end can never be fully achieved through wrong means. 


      Saturday, March 21, 2020

      Syllabus of physics in CUCET exam

      Mathematical Methods: Calculus of single and multiple variables, partial derivatives, Jacobian, imperfect and perfect differentials, Taylor expansion, Fourier series. Vector algebra, Vector Calculus, Multiple integrals, Divergence theorem, Green’s theorem, Stokes’ theorem. First order equations and linear second order differential equations with constant coefficients. Matrices and determinants, Algebra of complex numbers. 

      Mechanics and General Properties of Matter: Newton’s laws of motion and applications, Velocity and acceleration in Cartesian, polar and cylindrical coordinate systems, uniformly rotating frame, centrifugal and Coriolis forces, Motion under a central force, Kepler’s laws, Gravitational Law and field, Conservative and non-conservative forces. System of particles, Center of mass, equation of motion of the CM, conservation of linear and angular momentum, con-servation of energy, variable mass systems. Elastic and inelastic collisions. Rigid body motion, fixed axis rotations, rotation and translation, moments of Inertia and products of Inertia, parallel and perpendicular axes theorem. Principal moments and axes. Kinematics of moving fluids, equation of continuity, Euler’s equation, Bernoulli’s theorem.

      Oscillations, Waves and Optics: Differential equation for simple harmonic oscillator and its general solution. Superposition of two or more simple harmonic oscillators. Lissajous figures. Damped and forced oscillators, resonance. Wave equation, traveling and standing waves in one-dimension. Energy density and energy transmission in waves. Group velocity and phase velocity. Sound waves in media. Doppler Effect. Fermat’s Principle. General theory of image formation. Thick lens, thin lens and lens combinations. Interference of light, optical path retardation. Fraunhofer diffraction. Rayleigh criterion and resolving power. Diffraction gratings. Polarization: linear, circular and elliptic polarization. Double refraction and optical rotation.

      Electricity and Magnetism: Coulomb’s law, Gauss’s law. Electric field and potential. Electrostatic boundary conditions, Solution of Laplace’s equation for simple cases. Conductors, capacitors, dielectrics, dielectric polarization, volume and surface charges, electrostatic energy. Biot-Savart law, Ampere’s law, Faraday’s law of electromagnetic induction, Self and mutual inductance. Alternating currents. Simple DC and AC circuits with R, L and C components. Displacement current, Maxwell’s equations and plane electromagnetic waves, Poynting’s theorem, reflection and refraction at a dielectric interface, transmission and reflection coefficients (normal incidence only). Lorentz Force and motion of charged particles in electric and magnetic fields.

      Kinetic theory, Thermodynamics: Elements of Kinetic theory of gases. Velocity distribution and Equipartition of energy. Specific heat of Mono-, di- and tri-atomic gases. Ideal gas, van-der-Waals gas and equation of state. Mean free path. Laws of thermodynamics. Zeroth law and concept of thermal equilibrium. First law and its consequences. Isothermal and adiabatic processes. Reversible, irreversible and quasi-static processes. Second law and entropy. Carnot cycle. Maxwell’s thermodynamic relations and simple applications. Thermodynamic potentials and their applications. Phase transitions and Clausius-Clapeyron equation. Ideas of ensembles, Maxwell-Boltzmann, Fermi-Dirac and Bose Einstein distributions.
       
      Modern Physics: Inertial frames and Galilean invariance. Postulates of special relativity. Lorentz transformations. Length contraction, time dilation. Relativistic velocity addition theorem, mass energy equivalence. Blackbody radiation, photoelectric effect, Compton effect, Bohr’s atomic model, X-rays. Wave-particle duality, Uncertainty principle, the superposition principle, calculation of expectation values, Schrödinger equation and its solution for one, two and three dimensional boxes. Solution of Schrödinger equation for the one dimensional harmonic oscillator. Reflection and transmission at a step potential, Pauli exclusion prin-ciple. Structure of atomic nucleus, mass and binding energy. Radioactivity and its applications. Laws of radioactive decay.

      Solid State Physics, Devices and Electronics: Crystal structure, Bravais lattices and basis. Miller indices. X-ray diffraction and Bragg's law Intrinsic and extrinsic semiconductors, variation of resistivity with temperature. Fermi level. p-n junction diode, I-V characteristics, Zener diode and its applications, BJT: characteristics in CB, CE, CC modes. Single stage amplifier, two stage R-C coupled amplifiers. Simple Oscillators: Barkhausen condition, sinusoidal oscillators. OPAMP and applications: Inverting and non-inverting amplifier. Boolean algebra: Binary number systems; conversion from one system to another system; binary addition and subtraction. Logic Gates AND, OR, NOT, NAND, NOR exclusive OR; Truth tables; combination of gates; de Morgan’s theorem. 


      Thursday, January 2, 2020

      भारत का चौथा देश बनने का सपना

      भारत का वर्ष 2020 में चाँद पर अपना उपग्रह उतारने का प्रयास है। इससे पहले वर्ष 2019 में भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान को इसमें असफलता मिली थी। इस अभियान को अभी तक कोई नाम नहीं दिया गया है।

      भारत के अंतरिक्ष अनुसन्धान संसथान (इसरो) का चंद्रयान-3 मिशन के साथ चाँद की सतह पर रोवर-प्रोब उतारने की योजना पर सुचारु रूप से काम कर रहा है।

      इसरो के अध्यक्ष के॰ शिवन ने बताया, "हम इस वर्ष के अंत तक इसका प्रक्षेपण करने का लक्ष्य रख रहे हैं लेकिन ये अगले वर्ष भी हो सकता है।" इसके नवम्बर माह में प्रक्षेपित होने की संभावना बतायी जा रही है।

      इससे पहले ऐसा कार्य करने में अमेरिका, रूस और चीन सफल रहे हैं। भारत यदि इसमें सफलता प्राप्त करता है तो ऐसा करने वाला चौथा देश बन जायेगा लेकिन यह अभियान बहुत कम लागत वाला होगा। इसके अतिरिक्त भारत का वर्ष 2022 तक मानव को चन्द्रमा की कक्षा में भेजने की योजना है। इसके लिए चार अंतरिक्षयात्रियों का चयन किया जा चुका है। इन व्यक्तियों को इस माह के अंत तक रूस भेजा जायेगा जिनमें से तीन लोग इस अभियान का भाग बनेंगे। यह भारत के ब्रितानी शासन से मुक्ति की 75वें वर्ष में किया जायेगा।



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