पिछले ब्लॉग में हमने चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में अध्ययन किया और इस ब्लॉग में हम कृष्णिका विकिरण के बारे में लिख रहे हैं।
कृष्णिका विकिरण तापीय विकिरण होते हैं। किसी वस्तु के स्वयं के तापमान के कारण उत्सर्जित होने वाली विकिरणों को हम तापीय विकिरण कहते हैं। कृष्णिका विकिरण भी एक तरह की तापीय विकिरण ही होती हैं। इसके बारे में वर्ष 1792 में ब्रितानी वेजवूड पोर्सेलिन निर्माता थॉमस वेजवूड ने दिया था। उन्होंने अपने चुल्हे में यह प्रेक्षित किया था कि वो जिस वस्तु को भी गर्म करते हैं वो लाल रंग की हो जाती है। उनके द्वारा दिये गये नियम के अनुसार सभी वस्तुयें सभी तापमानों पर तापीय विकिरणों का उत्सर्जन करती हैं। अर्थात् मैं (लिखने वाला) और आप (पाठक) भी इस समय विकिरणों का उत्सर्जन कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे आसपास की सभी वस्तुयें तापीय विकिरणों को उत्सर्जित कर रही हैं। हमें सभी तापीय विकिरणें दिखाई नहीं देती और जो हमें दिखाई देती हैं उनका तरंगदैर्घ्य लगभग 4000 Å से 7000 Å तक होता है जिसे दृश्य प्रकाश कहा जाता है। सामान्य ताप पर किसी भी वस्तु से उत्सर्जित तरंगों का न्यूनतम तरंगदैर्घ्य लगभग 9500 Å होता है जो अवरक्त क्षेत्र से सम्बंधित होती हैं। यदि हम किसी वस्तु का तापमान बढ़ाते हैं और यह तापमान 1100 K (केल्विन) तक लेकर जाते हैं तो वह वस्तु लाल दिखाई देने लगती है। जब यह तापमान लगभग 3000 K के लगभग हो जाता है तो यह श्वेत-पीली रंग की दिखाई देने लगती है। उदाहरण के लिए आपने लुहार को लौहे को गर्म करते देखा होगा।
कृष्णिका उस वस्तु को कहते हैं जो इसपर गिरने वाले सभी तरह की विकिरणों को अवशोषित करने में सक्षम हो। अर्थात् अवशोषण में विकिरण के तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति अथवा आगमन के कोण पर निर्भरता नहीं होती। यह एक तरह से ऐसी विशिष्ट वस्तु होती है जिसपर गिरने वाली विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है और इसका किसी तरह का परावर्तन नहीं होता। यदि किसी सामान्य वस्तु पर कोई कोई विकिरण आपतित होती है तो सम्भावित घटानाओं में परावर्तन, अवशोषण और पारगमन (इसमें अपवर्तन भी) शामिल है। यदि इन तीनों की प्रायिकता क्रमश r, a और t हो तो r + a + t = 1 प्राप्त होगा क्योंकि कुल प्रायिकता एकांक ली जाती है। यदि हम कृष्णिका की बात करें तो केवल अवशोषण की बात करते हैं अर्थात् r = 0 और t = 0 है अतः a = 1 प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कृष्णिका विकिरण के लिए हम एक अन्य नियम की चर्चा करते हैं जिसे किरचॉफ़ का नियम कहते हैं जिसके अनुसार अच्छे अवशोषक अच्छे उत्सर्जक होते हैं। अर्थात् eλ/aλ नियत होता है जहाँ eλ उत्सर्जन क्षमता और aλ अवशोषण क्षमता को निरूपित करते हैं। तापीय साम्य अवस्था पर कृष्णिका के लिए eλ का मान इकाई होता है अतः उपरोक्त नियम के अनुसार aλ का मान भी इकाई होगा। इस तरह से हम समझ सकते हैं कि कृष्णिका को हम यह नाम क्यों देते हैं। चूँकि सामान्य तापमान पर हम किसी वस्तु को देखने के लिए उससे परावर्तित विकिरणों से देखते हैं लेकिन कृष्णिका किसी भी ताप पर किसी तरह का परावर्तन नहीं करती और अतः हम इसे कृष्णिका कहते हैं। कमरे के ताप पर यह काले रंग की दिखाई देती है लेकिन सभी तापमानों पर इसका काला दिखाई देना आवश्यक नहीं है जिसके सामान्य उदाहरणों में सूर्य और सामान्य बल्ब हैं जो तापीय नियम से हमें रोशनी देते हैं।
एक प्रायोगिक कृष्णिका का निर्माण करने के लिए हम एक खोखला गोला लेते हैं जिसके किसी एक स्थान पर एक छोटा सा छिद्र कर देते हैं। इस छिद्र का आकार गोले की तुलना में नगण्य है। गोले को आन्तरिक भाग को काले रंग कर दिया जाता है। चूँकि काले रंग को अच्छा अवशोषक माना जाता है। अब यदि कोई विकिरन उस छिद्र पर आपतित होगी तो वो गोले के अन्दर चली जायेगी जिससे गोले के अन्दर उस विकिरण के कुछ परावर्तन होंगे। चूँकि गोले के आन्तरिक भाग को काला किया गया है अतः परावर्तन की मात्रा बहुत कम होगी और उत्तरोत्तर प्रावर्तनों के पश्चात् विकिरण अवशोषित हो जाती है। गोले पर बने छिद्र को बाहर से देखने पर ज्ञात होता है कि उससे टकराने वाले विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है अतः यह छिद्र कृष्णिका का काम करता है। ध्यान रहे पूरा गोला कृष्णिका नहीं है और उसपर आपतित किरणें परावर्तन भी प्रदर्शित करता है। अतः यहाँ कृष्णिका के रूप में केवल गोले पर बने छिद्र को कहा जाता है।
यदि हम कृष्णिका का अध्यन किसी वर्णक्रममापी के साथ किसी एक निश्चित तापमान पर करें तो हमें ज्ञात होगा कि इससे उत्सर्जित विकिरणों की तीव्रता का एक निश्चित वर्णक्रम होगा जो तरंगदैर्घ्य में वृद्धि के साथ पहले शिथिलतः बढ़ता है और एक निश्चित मान के बाद वो पुनः कम होने लग जाता है जो अनन्त तरंगदैर्घ्य पर शून्य की तरफ अग्रसर होता है। किसी अन्य तापमान (जो पहले वाले से अधिक है) पर भी यह कुछ इसी तरह का होता है लेकिन इसके अधिकतम तीव्रता का मान बढ़ जाता है जो कम तरंगदैर्घ्य पर दिखाई देता है। यह वर्णक्रम कृष्णिका के पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। यह वर्णक्रम का आरेख सतत होता है जो यह प्रदर्शित करता है कि हमें सभी तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए वर्णक्रम प्राप्त होता है। यहाँ तीव्रता के अधिकतम मान पर स्थित तरंगदैर्घ्य और तापमान में एक निश्चित सम्बन्ध होता है। यह तरंगदैर्घ्य का मान तापमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात λmaxT = b होता है जहाँ b वीन नियतांक है। इस नियम को वीन विस्थापन नियम कहते हैं। इसी तरह कुल उत्सर्जन क्षमता मान ताप की चतुर्थ घात के समानुपाती होती है जिसे स्टीफन वोल्ट्समान का नियम कहते हैं।
उपरोक्त नियमों को एक साथ निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है:
- कृष्णिका विकिरण का मान केवल तापमान पर निर्भर करता है।
- कृष्णिका विकिरण का आरेख सतत होता है।
- कृष्णिका विकिरण की तीव्रता का मान शून्य तरंगदैर्घ्य से आरम्भ होती है और तरंगदैर्घ्य का मान बढ़ने के साथ बढ़ती है। एक निश्चित तरंगदैर्घ्य पर यह अधिकतम पर पहुँचने के पश्चात् पुनः कम होने लग जाता है।
- अधिकतम तीव्रता की स्थिति में इससे उत्सर्जित ऊर्जा का मान तापमान की पंचम घात के समानुपाती होती है।
- कुल उत्सर्जन क्षमता उपरोक्त के समाकलन से ज्ञात होती है जो तापमान के चतुर्थ घात के समानुपाती होती है।
अधिक दृश्य प्रभावों के साथ इसे देखने के लिए निम्नलिखित विडियों को देखा जा सकता है:
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