Thursday, October 10, 2024

सन् 2024 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार


दो बुजुर्ग व्यक्ति सामने की तरफ देखते हुये खड़े हैं।
सन् 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता:
जेफ्री हिंटन (बायें) और जॉन हॉपफील्ड (दायें)
आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क के साथ मशीन लर्निंग को लागू करने के अन्वेषण के लिए सन् 2024 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया। यदि आपको प्रोग्रामिंग भाषायें नहीं आती हैं या आप ये सीख रहे हैं तो आपको लगेगा कि ये तो कंप्यूटर विज्ञान के विषय होंगे। लेकिन ये भौतिकी मेंशोध कार्य में काम आने वाले बहुत बड़े उपकरण हैं। आज से लगभग 2 वर्ष पहले रसायन विज्ञान के एक भारतीय युवा वैज्ञानिक ने मुझे बताया था कि पहले प्रोटीन संरचना की खोज करना बहुत मुश्किल था लेकिन अब यह आसान हो गया है क्योंकि मशीन लर्निंग की सहायता से इनके संरचनायें बड़ी मात्रा में पहले से ही बता दी गयी हैं। अब हमें केवल प्रयोग करके उसकी पुष्टि करनी होती है। हम यहाँ इस विषय पर थोड़ी सी चर्चा करेंगे और बाद में भारत में नोबेल पुरस्कार नहीं मिलने पर भी कुछ बातचीत करेंगे। यदि आपको इसपर विस्तृत चर्चा चाहिए तो कृपया निर्देशक को लिखें जिससे एक यूट्यूब वीडियो उपलब्ध करवा दिया जायेगा।

मशीन लर्निंग को हिन्दी में यंत्र शिक्षण या स्वचालित शिक्षण भी कहते हैं। यह आर्टिफिशिलय इंटेलीजेंस (कृत्रिम बुद्धि) का एक प्रकार है। इसमें मशीन ही स्वयं से निर्णय लेती है। सरलतम रूप में इसे ऐसे समझ सकते हैं कि कार बनाने वाली कंपनी में जो रोबोट काम करते हैं, वो सामने किसी व्यक्ति को देखकर रुक जाते हैं। अन्य रूप में आप यह समझ सकते हो कि कुछ कारों को पीछे लेकर जाते समय उनका कैमरा पीछे की दीवार को देखता है और लगभग एक मीटर दूरी पर जोर से आवाज करने लगता है।  आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क को हिन्दी में कृत्रिम तंत्रिका तंत्र भी कह सकते हैं। यह गणितीय मॉडल है जो जविक तंत्रिका तंत्र  की संरचना एवं कार्यविधि का अनुसरण करता है। अर्थात् जैसे इंसानों में बच्चा जैसे सीखता है और आगे कार्य करता है, वैसे ही यहाँ होता है।

भारतीयों को भौतिकी में नोबेल पुरस्कार कभी नहीं मिली। चंद्रशेखर वेंकटरमन को जाब यह पुरस्कार मिला तब हम ब्रिटिश अधिपत्य में थे और स्वतंत्र भारत में केवल उन लोगों को मिला है जो भारत छोड़कर अन्य किसी देश में चले गये हैं। इसके कारणों में शोध कार्य के प्रति भारतीयों की कम रूचि और सरकारों द्वारा कम प्रचार-प्रसार शामिल है। इसके अतिरिक्त भारत की गरीबी और शिक्षा का अभाव भी इसका एक मुख्य कारण है। हर व्यक्ति पहले एक सुरक्षित जीवन चाहता है जो सामान्यतः सरकारी नौकरी में दिखाई देता है लेकिन यदि कोई रुचि से शोध कार्य करना चाहे तो उसे विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ता है। पहले संशाधनों की कमी होती है, दूसरा अनुसंधान की कम जानकारी है। हमारे यहाँ माता-पिता केवल पैसे के लेनदेन के बारे में अपने बच्चों को सिखाते हैं लेकिन वैज्ञानिक रुचि पैदा नहीं करते।

Sunday, December 10, 2023

अभाज्य संख्या p का वर्गमूल

अभाज्य संख्या (prime number) p का वर्गमूल (square root) अपरिमेय संख्या (irrational number) होती है। इसे तार्किक आधार पर सिद्ध कैसे करें?

इसे सिद्ध करने के लिए विरोध उपपत्ति अथवा अन्तर्विरोधज-प्रमाण (proof by contradiction) काम में लेते हैं। इसमें पहले यह मान लिया जाता है कि दिया गया वाक्य सत्य है और उसके आधार पर कुछ गणनाओं अथवा तथ्यों की जाँच की जाती है। हम पाते हैं कि वो विरोधाभाषी मिलती हैं जिससे स्पष्ट होता है कि हमने जो माना था वो असत्य था। यहाँ उपरोक्त उपपत्ति के लिए हम मान लेते हैं कि p एक परिमेय संख्या (rational number) है। इस स्थिति में

जहाँ a और b पूर्णांक संख्यायें (integers) हैं और b शून्यतर (non-zero) है। अंश (nominator) और हर (denominator) का पूर्णांक होना एवं हर का शून्यतर होना एक परिमेय संख्या की आवश्यक शर्त होती है। उपरोक्त समीकरण (equation) को शून्यतर संख्या b से गुणा करने पर

समीकरण को दोनों तरफ वर्ग (square) करने पर

a (अथवा b) के अभाज्य गुणनखण्ड (factorization) में प्रत्येक अभाज्य गुणक (prime factor), a2 (अथवा b2) के अभाज्य गुणनखण्डों में सम संख्या (even number) में होने चाहिए। उपरोक्त संख्या में बायीं तरफ b2 के सम संख्या में गुणक और एक अभाज्य संख्या p होने के कारण कुल अभाज्य गुणकों की संख्या विषम (odd) हो गयी। ठीक इसी तरह दायीं तरफ a2 के अभाज्य गुणकों की संख्या सम है। चूँकि दोनों तरफ संख्या समान होने की स्थिति में उपरोक्त कथन विरोधाभाषी है।

इसका अर्थ है कि हमने जो माना था वो असत्य था। अर्थात् अभाज्य संख्या p का वर्गमूल अपरिमेय होता है।

इसी तरह उन अपूर्ण वर्ग संख्या k के लिए भी सिद्ध किया जा सकता है कि k का वर्गमूल () अपरिमेय होता है। अपूर्ण वर्ग संख्या (not a perfect square) वो संख्या होती है जो किसी पूर्णांक का वर्ग नहीं होता।

Saturday, August 20, 2022

Rules written on back side of graduation program of Rajasthan University

Long back, I wrote rules written on marksheet of annual post graduation programs of Rajasthan University. Now, I thought to give the same details for under graduation programs too. So, I am copy pasting the things from backside of marksheets of under graduation program. These are only in annual scheme. If you wanna share the same for other universities in Rajasthan, please let me know or send me a copy of back side of the marksheet. I shall verify with officials and publish that here. Part written bellow is copy pasted from the year 2022.

NOTES:

  1. (A) A Candidate who is declared pass at the Part-I and Part-II of B.A./B.Sc./B.Com. Exam. (Pass & Honours Course) of 10+2+3 Exam shall be awarded Pass Class.
    (B) In the case of Part-III Exam. (Pass Course) minimum percentage of marks for a pass in First/Second division and pass class is 60%, 48% and 36% respectively in the aggregate marks of all the parts taken together.
    (C) IN the case of B.A./B.Sc./B.Com. Honours Part-III Exam. Minimum percentage of marks for a pass in First/Second division and pass class is 60%, 50% & 696 Marks (For BA/B.Com.) and 642 Marks (For B.Sc.) or above marks respectively in the aggregate of all the parts.
  2. (A) For a pass of the B.A./B.Sc./B.Com. Part-I, Part-II and Part-III Exam., A Candidate is required to obtain at least 36% marks in each Core/Optional and compulsory subject. Theory and practical separately. In the case of French and German subject candidate is required to obtain atleast 36% marks in theory and viva separately.
    (B) For declaring pass a candidate is required to obtain minimum 40% marks in each Honours subject and 36% marks in Subsidiary subject. For Gen. Hindi/Ele. Hindi/G. English/Elem. Computer/ENVS. (For Arts, Sci. & Com. Regular students) at the B.A./B.Sc./B.Com/ Pass course / honours Part-I, a candidate, is required to obtain 36% marks in theory and practical separately.
    (C) The marks obtained in compulsory subjects will not be countered for working out the division. A candidate who obtains 60% or more marks in compulsory subjects of Gen. Hindi and Gen. English at the Part-I Exam., Will be shown to have obtained proficiency in that subject(s).
    (D) A non commerce student appearing in B.Com. Exam, is required to pass the subject of Book-Keeping & Accountancy. The candidates are required to obtain 36% marks in the subject. The marks, however, are not an award of division.

  3. (A) Candidate failing in one subject at the B.A./B.Sc./B.Com. Part-III (10+2+3) examination are eligible to appear at the supplementary Exam. In that subject along with due of Part-II and Part-I.
    (B) A candidate who fails at the B.A./B.Sc./B.Com. Honours part-II Examination in (a) Not more than one theory paper/practical of the Hons. Subject  and / or (b) Not more than one theory paper/practical of the subsidiary subject shall be eligible to appear at the Supplementary Examination along with due of Part-II and Part-I.

  4. (A) A candidate failing in one or more compulsory subject and/or in one optional/core subject only at the B.A./B.Sc./B.Com. Part-I Exam. (Pass Course) shall be eligible to appear in the failing subject(s) alongwith the B.A./B.Sc./B.Com. Part-II Exam. (Pass Course).
    (B) A candidate who fails at the B.A./B.Sc./B.Com. Hons. Part-I Examination in (a) either one or more Compulsory subject(s) and/or (b) not more than one theory paper/practical of Honours subject and/or (c) not more than one theory paper/practical of the subsidiary subject. Shall be eligible to pass the same along with Part-II Examination subject to the provision of O 153-B.

  5. (A) Candidate failing in one subject at the part-II Exam. (Pass Course) shall be eligible to appear at the part-III subsequently Main Exam, alongwith due subject of part-II and/or Part-I.
    (B) A candidate who fails at the B.A./B.Sc./B.Com. Hons. Part-II Exam, in (a) not more than one theory paper/practical of the Hons. Subject and/or (b) not more than one theory paper/practical of the subsidiary shall be eligible to appear in the same alongwith Part-III Exam.

  6. A candidate who is appearing at the part-III Exam. (Pass Course) alongwith due subject of Part-II and/or Part-I (and declared either pass or supplementary at the Part-III Exam. But fails in the due subject of Part-II and/or Part-I will be eligible to appear at the Part-III Supplementary Examination.

  7. Where a subject comprises of two or more theory papers in pass course and a candidate failed in their aggregate but taking each paper separately obtain the minimum pass marks in one or more of them at the main examination he/she shall be required to reappear only in those paper(s) in which he/she failed to obtain the minimum pass marks.

    NOTE: The minimum pass marks prescribed for all the theory papers of a subject taken together, distributed over the different papers in the proportion of their maximum marks will give the minimum pass marks for each individual paper. If the marks so worked out are in fraction the same shall be raised to the next higher whole number.

  8. (A) A candidate who clears an optional/core subject and practical as due subject shall be deemed to have secured the minimum pass marks prescribed for that subject/practical for the purpose of determining division at the B.A./B.Sc./ And B.Com. Part-III Exam. (Pass Course) and for admission to the next higher class.
    (B) A Candidate who clears a paper/practical either of Honours or Subsidiary as due paper/practical shall be deemed to have secured the minimum pass marks prescribed for the paper/practical for the purpose of determining division at the B.A./B.Sc./ And B.Com. Honours Part-III Exam and for admission to the next higher class.

  9. (*) Star shown against the paper/subject denotes failure in that paper/subject.

  10. Any candidate who wants to Scrutiny/Revaluation of his/her result may apply online application within 15 days from the date of declaration of the result/issue of marksheet.

  11. In case of any mistake being detected in the preparation of marks sheet or brought to the notice afterward, the University will be fully empowered to correct the same (O. 169H)

Sunday, May 16, 2021

प्रकाश विद्युत प्रभाव और आइंस्टीन की व्याख्या

    नमस्कार, क्वांटम यांत्रिकी के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। यह इस विषय पर चौथा ब्लॉग है। यह ब्लॉग प्रकाश विद्युत् प्रभाव पर है। यह भौतिकी का इतना महत्त्वपूर्ण विषय है कि इसे छोटी कक्षाओं में पढ़ाना आरम्भ किया जाता है और बाद में स्नातक, परास्नातक और शोध तक लगातार चलता है। आजकल हमारे चारों तरफ जो भी सौर ऊर्जा के संयत्र देखते हैं अथवा भौतिकी के विभिन्न समूहों को सौर सेल पर काम करते देखते हैं, वो सभी भी प्रकाशविद्युत् प्रभाव जैसी ही तकनीकी, प्रकाशविभव प्रभाव पर आधारित होती है। इस तरह से इसके विभिन्न अनुप्रयोग हैं जिसपर बहुत अधिक कार्य चल रहा है। प्रत्येक ब्लॉग की तरह इसमें भी हम इतिहास से आरम्भ करेंगे, अर्थात् इसपर जिन वैज्ञानिकों ने काम किया उसका अध्ययन। उसके बाद हम इसके प्रायोगिक परिणामों का अध्ययन करेंगे जिसमें सम्बंधित उपकरणों के प्रेक्षण और परिणाम क्या रहे। इसके पश्चात् हम चिरसम्मत भौतिकी की असफलताओं का अध्ययन करेंगे जो हमें यह समझने में सहायक होगा कि चिरसम्मत भौतिकी प्रकशविद्युत् प्रभाव को समझाने में कैसे असफल रही। आखिर में हम महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के प्रकाशविद्युत् प्रभाव पर व्याख्या का अध्ययन करेंगे।

प्रकाश विद्युत् प्रभाव का इतिहास अथवा पृष्ठभूमि

    जैसा कि हम जानते हैं कि मैक्सवैल ने विद्युत्गतिकि में चार मूलभूत समीकरण दिये थे जिन्हें हम उनके सम्मान में मैक्सवेल समीकरण कहते हैं। इन समीकरणों के आधार पर मैक्सवेल ने बताया कि विद्युत्चुम्बकीय तरंगे c (प्रकाश की गति) गति से चलती है और एक तरंग रूप रखती है। मैक्सवैल का सिद्धान्त पूर्णतः सैद्धान्तिक था और इसी को समझने के लिए हर्ट्ज़ नामक वैज्ञानिक 1887 में प्रयोग कर रहे थे। हर्ट्ज़ वो वैज्ञानिक हैं जिन्होंने मैक्सवेल के विद्युत्चुम्बकीय सिद्धान्त प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया था। हर्ट्ज़ ने अपने प्रयोग में कुछ धातु की गोलों को विपरीत ध्रुवता की वोल्टता से जोड़ रखा था और उनके बीच में खाली स्थान रखा था अर्थात उच्च वोल्टता के साथ जुड़े हुये दोनों धात्विक गोले एक दूसरे से कुछ दूरी पर स्थित थे। उच्च ऊर्जा पर दोनों गोलों के मध्य चिंगारी उत्पन्न होती है। हर्ट्ज़ ने ये प्रयोग करते हुये पाया कि इन दोनों धात्विक गोलों के मध्य चिंगारी उत्पन्न होना सामान्य प्रयोग है लेकिन नकारात्मक ध्रुवता से जुड़े धातु के गोले पर यदि पराबैंगनी किरणें डाली जाती हैं तो चिंगारी की तीव्रता बढ़ जाती है। पराबैंगनी किरणों से चिंगारी की तीव्रता क्यों बढ़ जाती है, हर्ट्ज़ इसकी व्याख्या नहीं कर पाये और उन्होंने इस काम को आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन हर्ट्ज़ के दो सहायक थे जिनका नाम हॉलवाच और लिनार्ड। इन दोनों ने इस प्रयोग को आगे बढ़ाया और इसका प्रणालीगत प्रायोगिक अध्ययन किया। इसके लिए एक प्रयोग निर्मित किया और इसके परिणामों को लिखकर अध्ययन किया। अतः हम प्रयोगिक परिणामों का अध्ययन करते हैं। अतः अगला भाग प्रायोगिक परिणाम होगा।

प्रायोगिक परिणाम

    हॉलवाच और लिनार्ड ने प्रायोगिक व्यवस्था की जिसमें दो धातु की पत्तियाँ लगायी। एक पत्ती को नकारात्मक और दूसरी पत्ती को धनात्मक विभव से जोड़ा। विभव देने के लिए समायोजक बैटरी, एक अमीटर और एक वोल्टमीटर काम में लिया। समायोजक बैटरी एक ऐसी बैटरी है जिसमें विभवान्तर को हम नियंत्रित कर सकते हैं, अमीटर से परिपथ में धारा का मापन और वोल्टमीटर से दोनों प्लेटों के मध्य विभवान्तर का मापन किया गया। दोनों धातु की पत्तियों को एक निर्वातित काँच की नली में बन्द कर दिया। यहाँ निर्वातित का अर्थ काँच की नली में अधिकतम सम्भव निर्वात करने से है, अर्थात् उसमें उपस्थित हवा का घनत्व कम से कम किया जाता है। यहाँ नकारात्मक धातु की पत्ती इलेक्ट्रोनों के लिए उत्सर्जन का और धनात्मक पत्ती संग्राहक का काम करेगी इनको क्रमशः पत्ती A और B कह सकते हैं। अब पत्ती A पर कुछ प्रकाश आपतित किया जाता है जिससे इस पत्ती से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है जो संग्राहक प्लेट तक पहुँच जाते हैं। आपत्तित प्रकाश की एक सीमा से अधिक आवृत्ति रखने पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं और वो दूसरी प्लेट पर पहुँचने के कारण परिपथ में धारा का प्रवाह होता है। अब यहाँ पर पहला प्रश्न यह बनता है कि प्रयोग में निर्वातित काँच की नली की क्या आवश्यकता थी? इसपर आगे चर्चा करेंगे। इस प्रयोग के परिणामों में पहला परिणाम प्रकाशविद्युत प्रभाव था। यह प्रभाव इस तरह से था कि यदि किसी धातु की पत्ती पर जब किसी निश्चित आवृत्ति से अधिक आवृत्ति का प्रकाश आपत्तित किया जाता है तो उस धातु की पत्ती से इलेक्ट्रोन उत्सर्जित होते हैं जो परिपथ को पूर्ण करते हैं और हमें धारा मिलती है। इन इलेक्ट्रोनों को फोटोइलेक्ट्रोन कहते हैं, इसी तरहा से इन इलेक्ट्रोनों से जो धारा प्रवाहित होती है उसे फोटोकरंट अथवा प्रकाशविद्युत धारा कहते हैं। इस प्रभाव को प्रकाश विद्युत प्रभाव अथवा फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट कहते हैं। यहाँ हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह पुरानी परिभाषा है, नवीन परिभाषा के लिए हम धातु की पत्ती की जगह किसी भी पदार्थ की बात करेंगे। इसके अतिरिक्त प्रकाश की जगह हम विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की बात करेंगे। अर्थात् धातु के स्थान पर कोई भी पदार्थ एवं प्रकाश की जगह कोई भी विद्युत्चुम्बकीय तरंग हो सकती है। अब हम कुछ उदाहरण देखते हैं, क्योंकि कुछ पाठकों में यह भ्रम रह जाता है। माना कोई धातु A है जो ν आवृत्ति के प्रकाश पर प्रकाशविद्युत प्रभाव दिखाता है। अब यदि कोई आपको प्रश्न पूछे कि यहाँ प्रकाश के स्थान पर पराबैंगनी किरणें अथवा एक्स किरणें अथवा गामा किरणें डालें तो क्या प्रकाशविद्युत प्रभाव दिखाई देगा? तो इसका उत्तर होगा हाँ, बिलकुल दिखाई देगा, क्योंकि हमने एक न्यूनतम आवृत्ति से अधिक पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव की घटना होने को स्वीकार किया था। इन सभी की आवृत्ति दृश्य प्रकाश से अधिक है। अतः भ्रम न रखें कि केवल प्रकाश किरणों में ही प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाई देता है। इसी तरह से कुछ ऐसे पदार्थ जो धातु की नहीं बनी हैं वो भी प्रकाश विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करते हैं अर्थात् हमें धातुओं तक सीमित नहीं रहना है।

    प्रकाशविद्युत् प्रभाव की परिभाषा समझने के बाद हम इसे और समझने का प्रयास करते हैं। हमने परिभाषित करते समय एक न्यूनतम आवृत्ति की बात की। इस न्यूनतम आवृत्ति ν0 को हम क्रांतिक आवृत्ति अथवा देहली आवृत्ति कहते हैं। इससे कम आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होता है। इसके बराबर अथवा ज्यादा आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाई देगा। इसीलिए इसको क्रान्तिक आवृत्ति अथवा देहली आवृत्ति बोलते हैं। इसके बिलकुल विपरीत परिस्थिति लें तो वो होगा तरंगदैर्घ्य। यहाँ शर्त यह होगी कि λ < λ0 अर्थात् λ0 वह अधिकतम तरंगदैर्घ्य है जिसपर कोई धातु अथवा पदार्थ प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाता है। अर्थात् यदि कोई पदार्थ प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाता है तो उसका तरंगदैर्घ्य λ0 से कम होगा। इस अधिकतम तरंगदैर्घ्य को क्रान्तिम तरंगदैर्घ्य अथवा देहली तरंगदैर्घ्य कहते हैं। इस तरह से हमारी चर्चा क्रांतिक आवृत्ति पर भी हो गयी। अब अपने अगले प्रेक्षण की बात करते हैं। यदि हम दोनों पत्तियों पर आरोपित विभवान्तर ध्रुवता को विपरीत कर दें तो क्या होगा? अथवा हम आरोपित वोल्टता को शून्य कर दें तो क्या होगा, जबकि आपतित विद्युत् चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति देहली आवृत्ति से अधिक है।  या हम ऐसा करें कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव के प्रेक्षण के मध्य में आरोपित वोल्टता को शून्य कर दें तो क्या होगा? या उसी समय हम बैटरी की ध्रुवता बदल दें। अर्थात् उत्सर्जक प्लेट और संग्राहक प्लेट पर विद्युत् विभव का मान परिवर्तित कर दिया तब क्या होगा? इन दोनों ही परिस्थितियों में हमें प्रकाशविद्युत् प्रभाव प्रेक्षित होता है। लेकिन यदि हम नकारात्मक विभव का मान क्रमशः बढ़ाते जायें तो क्या होगा? यहाँ पर नकारात्मक विभव अमीटर की तुलना में है। इसको बढ़ाने से परिपथ में प्रवाहित धारा का मान कम होगा। एक निश्चित वोल्टता पर V0 पर परिपथ में धारा का मान्य शून्य प्राप्त होता है। नकारात्मक वोल्टता में और अधिक वृद्धि करने पर भी धारा का मान शून्य ही रहता है। जिस वोल्टता पर धारा का मान शून्य हो जाता है उस वोल्टता को निरोधी विभव अथवा स्टोपिंग पोटेंशियल कहते हैं। इस तरह से निरोधी विभव को दूसरे शब्दों में इस तरह समझा जा सकता है कि जब उत्सर्जक से इलेक्ट्रॉन निकलते हैं तो उनकी गतिज ऊर्जा अलग अलग होती हैं। उनकी गतिज ऊर्जा शून्य से आरम्भ होकर अधिकतम तक होती है। अर्थात् यह शून्य से आरम्भ होकर अधिकतम तक होती है। हमें लगभग हर ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन प्राप्त होते हैं। जब हम नकारात्मक विभव को बढ़ाते हुये V0 तक लेकर आते हैं तो क्या होता है? इस अवस्था में नकारात्मक विभव इलेक्ट्रॉनों को प्रतिकर्षित करता है, यह प्रतिकर्षण वोल्टता के बढ़ने के साथ बढ़ता है। अतः वोल्टता का नकारात्मक मान बढ़ने से संग्राहक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्रोनों की संख्या कम हो जाती है। इससे कम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन संग्राहक तक नहीं पहुँच पायेंगे लेकिन अधिक गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पहुँच जाते हैं। इस तरह से नकारात्मक विभव का मान बढ़ाने से यह होता है कि अधिकतम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पर संग्राहक तक नहीं पहुँच पाता है। ऐसी अवस्था की अधिकतम गतिज ऊर्जा KEmax और निरोधी विभव V0 में एक सीधा सम्बन्ध होता है। यह सम्बंध KEmax = eV0 से दिया जाता है अर्थात् अधिकतम गतिज ऊर्जा, प्रत्यारोपित वोल्टता और इलेक्ट्रॉन के आवेश के गुणनफल के तुल्य होती है। इस तरह से यहाँ हमने निरोधी विभव के लिए एक सम्बंध स्थापित किया है। अब हम इसका एक आरेख निर्मित करते हैं। यह आरेख हम फोटोकरंट अथवा प्रकाशविद्युत् धारा और वोल्टता के मध्य बनाते हैं। इसको हम पुनः समझने का प्रयास करते हैं कि इन दोनों चरों में क्या सम्बंध है। यदि हम x-अक्ष पर आरोपित वोल्टता और y-अक्ष पर प्रकाशविद्युत् धारा लेते हैं। यहाँ पर संग्राहक और अमीटर के मध्य वोल्टता को लिया गया है। आरेख में हम देखते हैं कि जब संग्राहक की वोल्टता का मान धनात्मक है तो धारा का मान थोड़ा बढ़कर नियत हो जाता है। यहाँ पर हम आपतित प्रकाश अथवा विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति का मान नियत और देहली आवृत्ति से अधिक लेते हैं। यदि इनकी तीव्रता का मान बढ़ाया जाता है तो धारा का मान भी उसी अनुपात में बढ़ता है। अर्थात् ये प्रेक्षण समान आवृत्ति और अलग अलग तीव्रता पर किया गया है। इससे तीव्रता का मान नियत करके वोल्टता को कम किया जाता है तो हमें देखने को मिलता है कि धारा का मान कम होता है। यहाँ हम पाते हैं कि जब संग्राहक और उत्सर्जक पर वोल्टता का मान समान होता है अथवा दोनों में विभवान्तर शून्य होता है तब भी हमें धारा थोड़ी कम प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है कि कम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन संग्राहक तक नहीं पहुँच पाते हैं। अर्थात् कम ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा का ह्रास कर देते हैं लेकिन जिनकी आवृत्ति अधिक है वो संग्राहक तक पहुँच जाते हैं और परिपथ को पूर्ण करके हमें धारा प्रदान करते हैं। अब हमनें संग्राहक की वोल्टता को नकारात्मक कर दिया। ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षित होना आरम्भ हो जायेंगे और इस वोल्टता का मान और अधिक बढ़ाने पर एक विशेष वोल्टता V0 पर संग्राहक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्रोनों की संख्या शून्य हो जाती है, इसका उल्लेख पहले भी किया जा चुका है कि इसे निरोधी विभव कहते हैं। चूँकि हमने पहले समझा है कि तीव्रता का मान बढ़ने पर धारा का मान बढ़ता है लेकिन निरोधी विभव पर धारा का मान प्रत्येक तीव्रता के लिए शून्य ही रहता है। अतः हमें यहाँ से एक महत्त्वपूर्ण परिणाम प्राप्त होता है। जब वोल्टता का मान V0 अथवा गतिज ऊर्जा का अधिकतम मान आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। चूँकि हमने अपने आरेख में समान आवृत्ति के लिए भिन्न भिन्न तीव्रताओं के लिए अध्ययन किया लेकिन निरोधी विभव का मान नियत प्राप्त हुआ जो अधिकतम गतिज ऊर्जा के समान है अर्थात् यह तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। इसके अतिरिक्त हमें अन्य परिणाम यह देखने को मिला कि प्रकाशविद्युत् धारा का मान देहली आवृत्ति से अधिक आवृत्ति के लिए आपतित प्रकाश की तीव्रता के समानुपाति होता है। यहाँ हम एक अन्य प्रेक्षण समझते हैं। यदि आरेख में y-अक्ष पर निरोधी विभव और x-अक्ष पर आवृत्ति रखें तो यह सरल रेखा प्राप्त होता है। जिसमें देहली आवृत्ति से कम आवृत्ति के लिए निरोधी विभव का मान शून्य होता है, आवृत्ति का मान बढ़ने पर निरोधी विभव का मान बढ़ता है। इस तरह से एक यह प्रेक्षण हमें प्राप्त होता है। अब यहाँ हमें यह ध्यान रखना होता है कि तीव्रता का मान जैसा सबको ज्ञात है, इकाई समय में इकाई क्षेत्रफल पर आपतित ऊर्जा का मान अर्थात् E/(tA) है, इसको आगे हम प्रयुक्त करेंगे। एकांक क्षेत्रफल पर एकांक समय में आपतित ऊर्जा को तीव्रता कहते हैं। यहाँ एक और प्रेक्षण यह था कि यह प्रक्रिया तात्क्षणिक प्रक्रिया है जिसे अंग्रेज़ी में इंस्टेटेनियस प्रोसेस कहते हैं अर्थात् जैसे ही हमने प्रकाश आपतित करवाया त्यों ही हमें धारा प्राप्त होती है। इसमें लगने वाला समय 10-9 सैकण्ड की कोटि का होता है अतः हम इसे तात्क्षणिक प्रक्रिया कहते हैं। जैसे ही प्रकाश आपतित हुआ, पती से इलेक्ट्रोन निकलते हैं और हमें परिपथ में धारा प्राप्त होती है। ये हमारे प्रायोगिक परिणाम हैं। अब हम चिरसम्मत भौतिकी की असफलता पर चर्चा करते हैं। 

चिरसम्मत भौतिकी की असफलता

    पहले हम चिरसम्मत भौतिकी की अवधारणा को समझेंगे कि यह इन प्रायोगिक परिणामों के सम्बंध में क्या अपवाद हैं? फिर हम इसकी असफलता को देखेंगे। चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार तरंग की तीव्रता (चूँकि हम यहाँ विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को काम में ले रहे हैं) का मान इसके आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है जो हमने यांत्रिकी में तरंगों का अध्ययन, रस्सी की तरंगे अथवा विद्युत्चुम्बकीय तरंगों में तरंग का अध्ययन करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब हम किसी तरंग की आवृत्ति के मान में वृद्धि करते हैं तो हम उसके आयाम में वृद्धि कर रहे हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि हम इलेक्ट्रॉन पर लगने वाले बल को बढ़ा रहे हैं जो उसके वेग में वृद्धि का कारण बनता है और उससे इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होनी चाहिए। अर्थात् हम तीव्रता में वृद्धि करके इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा में वृद्धि कर सकते हैं। लेकिन हमने प्रायोगिक परिणामों में देखा कि तीव्रता में वृद्धि होने पर इलेक्ट्रोनों की गतिज ऊर्जा नहीं बढ़ती अर्थात् इलेक्ट्रोनों की गतिज ऊर्जा का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। अतः चिरसम्मत भौतिकी इस परिणाम को समझाने में असफल रही। अतः चिरसम्मत भौतिकी प्रयोगिक परिणाम को नहीं समझा सकी और असफल रही। प्रायोगिक परिणाम में उपर उल्लिखित आरेख में हमने पाया कि सभी तीव्रता की तरंगों के लिए धारा, एक निश्चित वोल्टता पर शून्य हो गयी। दूसरा परिणाम तरंग सिद्धान्त से समझें तो हम पाते हैं कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव किसी भी आवृत्ति पर प्राप्त होना चाहिए। अर्थात् हम किसी भी आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव देख सकते हैं यदि एक निश्चित् तीव्रता की तरंगे आपतित होती हैं, ऐसा चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार होना चाहिए। लेकिन यह परिणाम भी प्रायोगिक रूप से गलत पाया गया। चूँकि हमने पाया कि तीव्रता बढ़ाने से प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं प्राप्त किया जा सकता यदि आपतित विकिरणों की आवृत्ति एक न्यूनतम आवृत्ति से कम है। अतः चिरसम्मत भौतिकी की यह संकल्पना भी गलत सिद्ध होती है। तीसरा प्रेक्षण यह है कि चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार माध्यम में तरंग संचरण तरंगाग्रों के रूप में होता है। तरंगाग्र माध्यम में उन बिन्दुओं के बिन्दुपथ को कहते हैं जहाँ तरंग समान कला में दोलन करती है। ये कई तरह के हो सकते हैं यह अपने स्रोत पर निर्भर करती हैं। यदि अपना स्रोत सममित गोलीय अथवा बिन्दु स्रोत है तो तरंगाग्र गोलीय अथवा गोलाकार होंगे यदि हमारा स्रोत बेलनी है तो तरंगाग्र बेलनाकार होंगे और यदि स्रोत बहुत अधिक दूरी पर स्थित हो तो हमें प्राप्त तरंगाग्र समतल होंगे। अर्थात् चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार तरंग की ऊर्जा का संचरण तरंगाग्रों से होता है और इसका वितरण तरंगाग्रों में समांगी होता है। अर्थात् यदि हम किसी तरंगाग्र की कल्पना करते हैं तो उसके प्रत्येक बिन्दू पर समान ऊर्जा वितरित हो रही है यदि इसके पिछे दूसरा तरंगाग्र आ रहा है और उसके आगे भी तरंगाग्र हो सकता है। इस तरह से तरंग संचरण हो रहा है तो इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का वितरण एकसमान अथवा समांगी रहता है ऐसा चिरसम्मत भौतिकी में तरंग सिद्धान्त में माना जाता है। अब जब यह तरंगाग्र किसी धातु की सतह पर आपतित होता है तो चूँकि यह कुछ क्षेत्रफल पर आपतित होगी और उसमें स्थिति सभी इलेक्ट्रोनों को समान रूप से प्राप्त होगी। अतः चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार यदि इलेक्ट्रोनों को पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है तो इलेक्ट्रोन अगले तरंगाग्र की प्रतीक्षा करेगा यदि फिर भी इलेक्ट्रोन के उत्सर्जन के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है तो यह उससे अगले तरंगाग्र की प्रतीक्षा करेगा। अर्थात् इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने से पहले बहुत बड़ी मात्रा में तरंगाग्रों की प्रतिक्षा करेगा। इसका मतलब यह हुआ कि तरंगाग्रों का धातु की पत्ती पर आपतन और इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन में कुछ समय लगेगा। अर्थात् कुछ समय विलम्ब होना चाहिए जबकि हमने अभी प्रायोगिक परिणामों में देखा कि प्रकाश के आपतन और इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन में कोई विलम्ब नहीं होता। अतः तरंगाग्र के अनुसार आने वाला समय के विलम्ब की अवधारण भी असफल रहती है। अर्थात् चिरसम्मत भौतिकी यह समझाने में असफल रही कि इन प्रायोगिक परिणामों को कैसे समझाया जाये। तो हमने इतिहास देखा, प्रायोगिक परिणाम देखे, उसके पश्चात् चिरसम्मत व्याख्या देखी। एक-एक करके हमने पाया कि चिरसम्मत अवधारणा प्रायोगिक परिणामों को समझाने में असफल रहे हैं तब उस समय हमारे सामने जो सिद्धान्त आया वो आइंस्टीन ने प्रस्तावित की। तो अब हम इसके अगले बिन्दु का अध्ययन करते हैं कि आंइस्टीन ने क्या सिद्धान्त प्रस्तावित किया और कैसे इनका सिद्धान्त फोटो-इलेक्ट्रोन अथवा प्रकाशविद्युत् प्रभाव को समझाता है।

आइंस्टीन की व्याख्या

    जैसा कि हमने पिछले ब्लोग में कृष्णिका विकिरण का अध्ययन किया। कृष्णिका विकिरण के लिए प्लांक सिद्धान्त की चर्चा की। प्लांक के अनुसार कोटर में उपस्थित दोलक, अप्रगामी तरंगों को अपनी ऊर्जा का स्थानान्तरण, जो कि धातु से तरंगों में होता है, वह विविक्त है। अर्थात् धातु से तरंगों के मध्य ऊर्जा का स्थानान्तरण विविक्त है। उस समय प्लांक ने माना कि जो विकिरण हैं वो एक बार दोलक से ऊर्जा प्राप्त करने के पश्चात् वो सामान्य तरंगों की तरह व्यवहार करती हैं अर्थात् संचरण में तरंगों की तरह व्यवहार करती हैं। लेकिन आइंस्टीन ने इस सिद्धान्त को नहीं माना बल्कि आइंस्टीन ने माना कि प्रकाश तरंगें भी कणों से मिलकर बनी हैं जिन्हें हम यहाँ पर फोटोन कहते हैं। आइंस्टीन ने पहली बार प्रतिपादित किया कि विद्युत्चुम्बकीय विकिरणें पदार्थ से जो ऊर्जा प्राप्त करती हैं, केवल वह विविक्त नहीं है जबकि इनका संचरण भी विविक्त होता है जो E = nhν के अनुसार विविक्त रहता है। यहाँ पर ऊर्जा hν को फोटोन कहते हैं। यह पहली बार आइंस्टीन ने बताया। अर्थात् आइंस्टीन के अनुसार यदि निश्चित तीव्रता पर अधिकतम गतिज ऊर्जा, आवृत्ति का फलन होनी चाहिए। जैसा हमने आरेख में देखा था, अर्थात् आवृत्ति बढ़ने पर अधिकतम गतिज ऊर्जा का मान बढ़ना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि निरोधी विभव का मान भी बढ़ना चाहिए। इस तरह आइंस्टीन की यह परिकल्पना बिलकुल सही थी जो प्रायोगिक मानों की पुष्टि करता है। उनकी दूसरी परिकल्पना यह थी कि फोटो-कैथोड़, जिसे हमने उत्सर्जक कहा है, पर आने वाली विकिरणें जब आपतित होती हैं तो वो फोटोन के रूप में आती हैं। इस बार वो सतत नहीं हैं, तरंगाग्र के रूप में नहीं आ रही। आइंस्टीन की व्याख्या के अनुसार वो फोटोन के रूप में आ रही हैं, कुछ कणों के रूप में आ रही हैं। अतः एक फोटोन केवल एक इलेक्ट्रॉन से ही क्रिया करता है। अतः एक इलेक्ट्रॉन, एक फोटोन को पूर्णतः अवशोषित कर लेता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है, तरंग सिद्धान्त में ऐसा नहीं था। यहाँ पर एक इलेक्ट्रॉन अपने उपर गिरने वाले एक फोटोन का अवशोषण करता है और यदि उस फोटोन की ऊर्जा पर्याप्त है, अर्थात् hν में ν आपतित विकिरण की आवृत्ति है जो एक न्यूनतम आवृत्ति से अधिक है तो फोटोन इलेक्ट्रॉन के साथ अवशोषित होकर उस इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाल देता है। अतः यह इसका समर्थन करता है कि इस प्रक्रिया में कोई समय नहीं लगेगा। अर्थात् इलेक्ट्रॉन बाद में आने वाले फोटोन की प्रतीक्षा नहीं करता है। अतः इलेक्ट्रॉन अन्य फोटोनों की प्रतीक्षा नहीं अक्रता और एक ही फोटोन को पूर्णतः अवशोषित करता है। यदि यह पर्याप्त ऊर्जा है तो वो बाहर निकलेगा और यदि यह पर्याप्त नहीं है तो वो पदार्थ के अन्दर ही रहेगा। अब हम आगे देखते हैं कि इससे आइंस्टीन ने क्या बताया। इसमें आगे बढ़ने से पहले हम कार्यफलन को परिभाषित करते हैं। हम न्यूनतम आवृत्ति से अधिक आवृत्ति की बात करते हैं तो यह न्यूनतम ऊर्जा किसका फलन है? किसपर निर्भर करती है? इसकी निर्भरता पदार्थ पर होती है। इसके लिए सही शब्द कार्यफलन है। कार्यफलन किसे कहते हैं? वह न्यूनतम ऊर्जा जो किसी इलेक्ट्रोन को धातु की सतह से अलग करने के लिए आवश्यक हो, उसे उस धातु के कार्यफलन के रूप में जाना जाता है। किसी धातु की सतह से किसी इलेक्ट्रोन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को उस धातु का कार्यफलन कहते हैं। इसे अंग्रेज़ी में वर्क-फंक्शन कहते हैं। यह किसका गुणधर्म है? तो यह पदार्थ का गुणधर्म है। यह अलग अलग धातुओं के लिए अलग अलग होता है। तो किसी भी धातु से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए ऊर्जा देनी होगी। उस ऊर्जा के बिना इलेक्ट्रॉन बाहर नहीं आयेगा उसको कार्यफलन कहते हैं। इसे हम फाई (φ) से लिखते हैं और इसको हम hν0 के समान लिखते हैं जहाँ ν0 देहली आवृत्ति है, यह वह आवृत्ति है जिससे कम आवृत्ति पर इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन नहीं होगा। कार्यफलन जैसा ही हम एक अन्य भौतिक राशी का भी अध्ययन करते हैं जिसे आयनीकरण विभव कहते हैं। यहाँ एक जैसे दो बिन्दू आ रहे हैं अतः हम इसकी चर्चा कर रहे हैं। कार्यफलन की तरह आयनीकरण ऊर्जा की परिभाषा यह है कि किसी विलगित परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को उस परमाणु की आयनीकरण विभव कहते हैं। अतः किसी परमाणु से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आयनीकरण ऊर्जा कहते हैं और एक धातु से इलेक्ट्रोन निकालने को कार्यफलन कहते हैं। क्या आप दोनों में सम्बंध स्थापित कर सकते हैं? कार्यफलन का मान लगभग आयनीकरण विभव का आधा होता है। ऐसा क्यों होता है, क्या आप बता सकते हैं? ऐसा इसलिए होता है धातु के अन्दर बहुत परमाणु एकसाथ बैठे होते हैं अतः उनकी स्थितिज ऊर्जा का मान, एक दूसरे के प्रभाव को कम करने से कम हो जाती है और केवल सीमायें अलग रहती हैं। लेकिन आयनीकरण में परमाणु विलगित है अतः उससे इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए हमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। ये समानार्थी विषय होने के हमने इसकी चर्चा की। अब हम आगे बढ़ते हैं। अब हम कुछ धातुओं को उदाहरण के रूप में लेते हैं और उनके कार्यफलन का मान लिखते हैं। सीज़ियम, पोटैशियम और सोडियम के कार्यफलन का मान क्रमशः 1.9 eV, 2.2 eV और 2.3 eV हैं, ये आपको याद होना चाहिए कि कार्यफलन का मान हम इलेक्ट्रॉन वोल्ट में रखते हैं। अब हम आइंस्टीन की प्रकाशविद्युत् प्रभाव समीकरण की बात करते हैं।

    प्रकाशविद्युत् प्रभाव समीकरण की परिकल्पना आइंस्टीन ने कैसे की? माना कि आपतित फोटोन की ऊर्जा hν है और धातु के लिए कार्यफलन का मान hν0 है। अब हम दो परिस्थितियों की चर्चा करते हैं। पहला जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से अधिक है और दूसरा जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से कम है। पहली अवस्था में जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से अधिक है तब हमें प्रकाशविद्युत् देखने को मिलेगा और अन्य स्थिति में जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से भी कम है तो प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होगा। अतः आइंस्टीन ने यह बताया कि इनका अन्तर (hν - hν0) इस तरह से होगा, कि इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए हमें hν0 ऊर्जा देनी होगी और हमारे पास hν ऊर्जा है और इनका अन्तर वो ही इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा होगी। यहाँ से हमारे पास जो समीकरण आती है वो अधिकतम गतिज ऊर्जा = hν - hν0 है जिसे कई बार hν - φ भी लिख देते हैं। इसे हम आइंस्टीन की प्रकाश विद्युत् समीकरण लिखते हैं। अधिकतम गतिज ऊर्जा को यदि KEmax लिखें तो हम उपरोक्त समीकरण को KEmax = (1/2)mvmax = hν - hν0 भी लिख सकते हैं। गतिज ऊर्जा को निरोधी विभव (stopping potential) के रूप में लिखने पर KEmax = eV0 = hν - hν0 लिख सकते हैं। अब हम और आगे देखते हैं। अब देखिये यहाँ पर अपने पास में यह समीकरण आयी V0 = (h/e)ν - (h/e)ν0 जिसको हमने एक बॉक्स में बन्द कर दिया। क्यों कर दिया? क्योंकि यह y = mx + c की तरह एक रेखा की समीकरण है जिसमें c अंतःखण्ड (y-अक्ष पर) होता है और m उसका ढ़ाल होता है। अतः उपरोक्त समीकरण में हम देखें तो हमें ज्ञात होगी कि निरोधी विभव और आवृत्ति में जो ग्राफ प्राप्त होता है वो रेखीय होना चाहिए। हमने पहले x-अक्ष पर ν0 से आरम्भ होने वाला ग्राफ बनाया था अतः यह वही ग्राफ प्राप्त होता है। इस समीकरण में हमें y-अक्ष पर अंतःखण्ड का मान -h/e प्रात हुआ है अतः यह मान हमें नकारात्मक अक्ष पर मिलेगा जो φ=-hν0/e होगा। इसमें ढ़ाल tanθ का मान m=h/e प्राप्त होता है जहाँ h प्लांक नियतांक और e इलेक्ट्रॉन का आवेश है, जो दोनों की सार्वभौमिक नियतांक हैं। इसका अर्थ है कि सभी पदार्थों के लिए आवृत्ति और निरोधी विभव के मध्य ग्राफ का ढ़ाल नियत रहेगा। ढ़ाल नियत रहने का अर्थ है रेखायें समान्तर होंगी। अतः एक धातु का ग्राफ यदि एक जगह है तो दूसरे धातु का ग्राफ भी इसके बायीं अथवा दायीं तरफ इसके समान्तर रेखा के रूप में प्राप्त होगा। अर्थात् इन सभी का ढ़ाल समान और नियत रहेगा। यह बहुत ही उपयोगी परिणाम है और कई बार परीक्षाओं में पूछा जाता है। इसके पीछे की भौतिकी बहुत ही सुन्दर है कि रेखायें का ढ़ाल h/e है जो कि सार्वभौमिक नियतांक है और सभी पदार्थों के लिए समान रहती है। फिर अलग क्या होता है? अंतःखण्ड अलग अलग होता है और अंतःखण्ड वास्तव में क्या है? यह (h/e)ν0 है। h/e यहाँ पर भी सार्वभौमिक नियतांक है लेकिन इसके साथ में ν0 भी है। ν0 देहली आवृत्ति है जो कि पदार्थ का गुणधर्म है अतः अंतखण्ड सभी पदार्थों के लिए अलग-अलग मिलता है लेकिन ढ़ाल समान रहता है। इस तरह यह समीकरण प्रायोगिक परिणामों के साथ सुम्मेलित होती है और प्रायोगिक परिणाम और समीकरण समान परिणाम देते हैं अर्थात् प्रायोगिक परिणामों पूर्ण व्याख्या इस समीकरण से प्राप्त होती है।

    अब आइंस्टीन के सिद्धान्त के बारे में हम परिणाम के रूप में क्या कह सकते हैं? वो यह है कि अधिकतम गतिज ऊर्जा और निरोधी विभव का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। चूँकि तीव्रता का मान फोटोनों की एकांक समय में एकांक क्षेत्रफल में संख्या को कहते हैं। अतः यदि एक फोटोन की ऊर्जा को हम E लिखें तो यह nE/(tA) तीव्रता को निरूपित करता है जहाँ n फोटोनों की संख्या है। अतः तीव्रता बढ़ाने का अर्थ यह है कि हम फोटोनों की संख्या बढ़ा रहे हैं न कि तीव्रता में परिवर्तन कर रहे हैं अतः अधिकतम गतिज ऊर्जा और निरोधी विभव का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। यह पहला परिणाम है जो समीकरण द्वारा समझाया जा सकता है। इस प्रकार हम तीव्रता बढ़ाकर प्रकाशविद्युत् धारा का मान तो बढ़ाते हैं लेकिन निरोधी विभव अथवा अधिकतम गतिज ऊर्जा का मान नहीं बढ़ाते। यह उपर समझाये गये ग्राफ से सहमत है जिसमें हम विभिन्न धाराओं के बारे में चर्चा कर रहे थे। दूसरा परिणाम यह है कि यदि आवृत्ति का मान ν0 से कम है तो प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होगा और यह भी प्रायोगिक परिणामों से सहमत है। तीसरा परिणाम यह है कि एक फोटोन एक इलेक्ट्रॉन द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है। यदि फोटोन की ऊर्जा देहली ऊर्जा से अधिक है तो एक इलेक्ट्रॉन, उस फोटोन को पूर्णतः अवशोषित करके उसी समय उत्सर्जित हो जायेगा और इसमें समय नहीं लगेगा। अतः प्रायोगिक परिणामों में चिरसम्मत भौतिकी असफल रही क्योंकि उसमें माना गया कि विद्युत्चुम्बकीय विकिरणें तरंग रूप में मानी गयी जबकि भौतिकी के इतिहास में यहाँ पहली बार यह बताया गया कि ये विकिरणें भी छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी होती हैं और बाद में इन कणों को फोटोन नाम दिया गया। इस फोटोन के अस्तित्व को स्वीकार करते हुये आइंस्टीन ने प्रकाशविद्युत् प्रभाव को सफलतापूर्वक समझाया। आइंस्टीन ने भौतिकी के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं काम किया है जैसे उष्मागतिकी और सांख्यिकीय भौतिकी में काम किया है, आइंस्टीन ने विशिष्ट आपेक्षितकता पर स्वयं काम किया है, आइंस्टीन क्वांटम यांत्रिकी के प्रणेता थे जिसे अंग्रेज़ी में गॉडफादर कहते हैं लेकिन इन सबके बावजूद आइंस्टीन को 1921 में प्रकाशविद्युत् प्रभाव के इसी काम के लिए मिला। आइंस्टीन ने यह काम वर्ष 1905 में किया था लेकिन इसके काम के लिए वर्ष 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अब हम छोटी सी चर्चा इसपर करते हैं कि फोटोन क्या होता है?

फोटोन

    फोटोन क्या होता है? पहली बार किसने बताया? सबसे पहले आइंस्टीन ने बताया कि विद्युत्चुम्बकीय तरंगों का प्रसरण, जो ऊर्जा रखती हैं वो भी कण रूप में होती हैं और उसको नाम दिया फोटोन। अतः हम यहाँ एक वाक्य लिख सकते हैं कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण रूप को प्रदर्शित करता है। प्रकाशविद्युत् प्रभाव क्या प्रदर्शित करता है? प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण स्वरूप को बताता है। तरंगों का कण रूप! कुछ दुविधा हुई? बहुत कुछ मिश्रित हुआ। इस श्रेणी के पहले ब्लॉग में हमने चर्चा की थी कि चिरसम्मत यांत्रिकी कण और तरंग को एकदम अलग और अनन्य घटना मानती है लेकिन क्वांटम यांत्रिकी में कण और तरंग अलग-अलग जैसा कुछ नहीं होता। यहाँ पर विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को तरंग रूप में माना जाये तो हम प्रकाशविद्युत् प्रभाव को नहीं समझा सकते। अतः इसीलिए लिखा है कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण रूप को निरूपित करता है। यहाँ कौनसी तरंगों की बात कर रहे हैं? ये चिरसम्मत तरंगों की बात कर रहे हैं जिनको अब तक हम चिरसम्मत तरंगों के रूप में देख रहे थे वो क्वांटम यांत्रिकी में कुछ प्रयोगों में कण जैसा व्यवहार प्रदर्शित कर रही हैं। अब यहाँ से ही बात करते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी में एक फोटोन एक कण के रूप में व्यवहार रखता है। यह सामान्य कण नहीं है, ये क्वांटम यांत्रिकी का कण है। यह कैसा कण है? यह ऐसा कण है जिसका विराम द्रव्यमान शून्य है। विराम द्रव्यमान आप समझते हैं? जिसे हम m0 से निरुपित करते हैं जो आपने विशिष्ट आपेक्षिकता में भी पढ़ा है। इसका मतलब क्या है? इसका भौतिक अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि फोटोन विराम में नहीं रहता। अर्थात् यदि फोटोन अस्तित्व में है तो हमेशा c वेग से गति करता है। यह कभी विराम में नहीं रहता क्योंकि इसका विराम द्रव्यमान शून्य है जिसका अर्थ है कि यह हमेशा c वेग से ही गति करता है। इसके अतिरिक्त फोटोन की ऊर्जा hν होती है जहाँ ν विकिरण की आवृत्ति को निरूपित करता है। इसका संवेग क्या होता है? इसका संवेग E/c होता है। चूँकि यह एक कण है अतः इसका संवेग भी होता है। जैसे अन्य कणों के लिए एक भौतिक राशी संवेग होती है वैसे ही फोटोन के लिए भी संवेग होता है और उसे E/c से लिखा जाता है जिसे हम hν/c अथवा h/&;lambda; भी लिख सकते हैं। आपेक्षिकता का सूत्र हम E2 = p2c2 + m02c4 से लिखते हैं जो किसी भी कण के लिए ऊर्जा और द्रव्यमान में सम्बंध को बताता है। यह सम्बंध द्रव्यमान, ऊर्जा और संवेग के सम्बंध को बताता है। जब न्यूटनीय यांत्रिकी असफल हो जाती है जिसमें कण का वेग प्रकाश के वेग के तुल्य (एक ही कोटि का) हो जाता है तब इस सूत्र से हम सम्बंध बताते हैं। अब हम यहाँ देखते हैं कि फोटोन के लिए विराम द्रव्यमान शून्य होता है अतः E2 = p2c2 प्राप्त होता है जिससे हम p=E/c लिख सकते हैं। अर्थात् यह कण विशिष्ट आपेक्षिकता के उस सूत्र में भी सटीक परिणाम देता है जिसमें हम द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बंध के रूप में स्थापित करते हैं, यहाँ ध्यान रहे कि फोटोन का विराम द्रव्यमान शून्य है। इस तरह से हमनें संक्षिप्त में बताया कि एक फोटोन के क्या क्या गुणधर्म होते हैं? अब इस ब्लॉग को हम यहाँ पूर्ण करते हैं जिसमें हमने बात की कि क्यों प्रकाशविद्युत् प्रभाव महत्त्वपूर्ण है? उसके क्या क्या विभिन्न पहलू हैं? कौन कौनसे वैज्ञानिकों ने इसमें योगदान दिया? चिरसम्मत भौतिकी कैसे प्रकाशविद्युत् प्रभाव को समझाने में असफल रही और आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने एक क्रान्तिकारी विचार रखते हुये कि प्रकाशविद्युत् विकिरणें तरंगों के रूप में नहीं बल्कि छोटे-छोटे कणों के रूप में ऊर्जा को को प्रसरित करती हैं, जैसे विचार से इसको सफलतापूर्वक समझाया और इसके लिए उन्हें 1921 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तो ये था आज के हमारे इस फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट के बारे में। धन्यवाद!

उपरोक्त विषय की वीडियो के रूप में व्याख्या के लिए निम्नलिखित वीडियो देखें:



Monday, August 31, 2020

प्लांक का विकिरण नियम

    हमने क्वांटम यांत्रिकी के प्रथम ब्लॉग में चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में बात की और दूसरे ब्लॉग में कृष्णिका विकिरण से परिचय किया। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम क्वांटम यांत्रिकी के स्थान पर चिरसम्मत यांत्रिकी के ब्लॉग लिख रहे हैं। ये सब इसलिए आवश्यक है कि उस समय के वैज्ञानिक क्या कर रहे थे और उस समय क्या हो रहा था और अलग अलग वैज्ञानिक कौनसी समस्याओं पर उस समय काम कर रहे थे। ये सब इनके ऐतिहासिक महत्त्व को समझाता है। बिना इसके हम विषय का मूल्य और महत्त्व नहीं समझ सकते। आज का ब्लॉग प्लांक विकिरण नियम पर रहेगा।
    कार्य के आधार पर भौतिकी का विकास दो अलग अलग धाराओं में हुआ। अर्थात् भौतिकी को हम दो भागों में विभक्त कर सकते हैं जिनमें एक सैद्धान्तिक भौतिकी है और अन्य प्रायोगिक भौतिकी। इसमें कई बार प्रायोगिक कार्य पहले कर लिया जाता है और बाद में उसे समझने के लिए सैद्धान्तिक विकास किया जाता है। ठीक इसी तरह कई बार सैद्धान्तिक भौतिकी किसी प्रयोग के सफल होने की प्रतीक्षा नहीं करती। सैद्धान्तिक भौतिकी का सबसे अच्छा और सफल उदाहरण लार्ज हैड्रॉन कोलाइडर के रूप में देखा जा सकता है जिसे हम महाप्रयोग भी कहते हैं, यह कण भौतिकी के मानक मॉडल पर आधारित है। यह सैद्धान्तिक उच्च ऊर्जा भौतिकी की सफलता का सबसे बड़ा उदाहरण है। लेकिन क्वांटम यांत्रिकी का जो विकास हुआ है वो तात्कालिक प्रायोगिक परिणामों को पूर्ववत्ती सैद्धान्तिक भौतिकी द्वारा नहीं समझाने का परिणाम है। ऐसी अवस्था में भौतिक विज्ञानीयों को नये सिद्धान्त से भौतिकी को समझने का प्रयास करने का अवसर मिला। इसके परिणामस्वरूप क्वांटम यांत्रिकी का विकास हुआ और भौतिक विज्ञान में एक नये सिद्धान्त का प्रतिपादन हुआ।
    19वीं सदी के अन्त (उत्तरार्द्ध) में और 20वीं सदी के प्रारम्भ (पूर्वार्द्ध) में विश्व में विभिन्न प्रयोग किये गये जो सैद्धान्तिक समझ से उल्लिखीत नहीं हो सके। इसको ऐसे कह सकते हैं कि 20वीं सदी के प्रारम्भ के प्रयोगों की तात्कालीक रूप से सैद्धान्तिक व्याख्या उपलब्ध नहीं थी। उदाहरण के लिए कृष्णिका विकिरण वर्णक्रम, फोटो-इलेक्ट्रिक प्रभाव, कॉम्पटन प्रभाव, युग्म उत्पादन शामिल हैं। ये वो प्रयोग थे जो तात्कालीक सिद्धान्तों से नहीं समझाये जा सके। इनकी व्याख्या के लिए हमें नये सिद्धान्तों की आवश्यकता पड़ी जिसे हम क्वांटम यांत्रिकी के जन्म के रूप में देखते हैं।
    सबसे पहले हम कृष्णिका विकिरण के बारे में बात करते हैं। इसको समझने के लिए विकसित चिरसम्मत सिद्धान्तों को समझते हैं। ऐसा कहना गलत होगा कि वैज्ञानिकों ने इस सिद्धान्त को समझने का प्रयास नहीं किया। तात्कालिक रूप से वैज्ञानिकों ने इसको समझने के बहुत सफल प्रयास किये और उनके प्रयासों को उत्तरोत्तर क्रम में वैज्ञानिकों द्वारा नये सिद्धान्त को प्रतिपादित करने में काम में लिया गया। यहाँ पर सबसे पहले हम हम वीन विकिरण नियम का अध्ययन करेंगे। यह वही वीन है जिसका विस्थापन नियम पिछले ब्लॉग में समझाया गया है जिसमें हमने λmaxT = b लिखा था। वीन विकिरण नियम को वीन सन्निकटन नियम भी कहते हैं। इसका गणितीय सूत्र Eλdλ = Aλ-5e-a/λTdλ है जहाँ A और a नियतांक हैं और λ तरंगदैर्घ्य है। यह तरंगदैर्घ्य के फलन के रूप में वीन विकिरण नियम को निरूपित करता है और यह मैक्सवेल वोल्ट्समान सांख्यिकी पर आधारित है। यदि हम इस नियम को आवृत्ति के फलन के रूप में लिखने के लिए हमें c = νλ का प्रयोग करते हुये λ = c/ν ⇒ dλ = -(c/ν2)dν लिख सकते हैं। यहाँ पर हम कह सकते हैं कि dλ और dν में विपरित चिह्न हमें तरंगदैर्घ्य में वृद्धि को आवृत्ति में कमी को समझाता है। इससे हमें वीन विकिरण नियम Eνdν = A(ν3/c4)exp(bν/T) dν प्राप्त होता है। इस तरह से हमने ऊर्जा/तीव्रता को तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति के रूप में लिख दिया है। अब हम इसको कृष्णिका विकिरण के लिए समझें तो यह पूर्ण वर्णक्रम को समझाने में अक्षम रहा। यह केवल तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए सफल था लेकिन उच्च तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए यह नियम असफल रहा। जब हम इसको प्रायोगिक वक्र के साथ देखें तो यह तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए सुम्मेलित होता है लेकिन उच्च मानों पर यह असफल रहता है। इसी को हम यदि आवृत्ति के रूप में देखें तो यह उच्च आवृत्ति मानों के लिए सफल रहता है लेकिन निम्न आवृत्ति मानों के लिए पूर्णतः असफल रहता है।


दूसरा हम रेले-जीन्स विकिरण नियम का अध्यन करेंगे। लॉर्ड रेले और जेम्स जीन्स दो वैज्ञानिक थे जिन्होंने यह नियम दिया। इस नियम को सामान्यतः रेले-जीन्स नियम भी कहते हैं। इनका नियम दो अभिगृहितों पर आधारित था। इनका पहला अभिगृहित यह था कि जो बतलाता है कि अप्रगामी विद्युत्चुम्बकीय तरंगे गुहा (कैविटी) के अन्दर सन्निहित होती हैं। उनका यह अभिगृहित विद्युत्चुम्बकीय सिद्धान्तों पर आधारित था अतः इसे हम विद्युत्चुम्बकीकी का सिद्धान्त कह सकते हैं। उनके दूसरे अभिगृहित के अनुसार उन्होंने किसी अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा की गणना के लिए समविभाजन प्रमेय को काम में लिया। यह दूसरा नियम उष्मागतिकी पर आधारित था। उन्होंने इसके लिए पिछले ब्लॉग में उल्लिखित अनुसार एक प्रायोगिक कृष्णिका की कैविटी को माना। हम पिछले ब्लॉग के अनुसार एक गोले को अन्दर से काला करके एक लघु छिद्र बनाकर उसे किसी निश्चित तापमान तक गर्म होने देते हैं। अब हम यह समझते हैं कि गुहा के अन्दर विद्युत्चुम्बकीय तरंगे कहाँ से आयी? अतः हम अपनी लघु छिद्र को किसी निश्चित ताप T पर अध्ययन करते हैं जब यह तापीय साम्य में है। इस तापमान पर इस गुहा में स्थित इलेक्ट्रॉन तापीय ऊर्जा के कारण यादृच्छिक आवृत्त गति करेंगे। चूँकि आवृत्त गति त्वरित गति होती है और उस अवस्था में कोई भी त्वरित आवेशित कण विद्युत्चुम्बकीय तरंगे उत्सर्जित करता है। अतः किसी निश्चित् तापमान पर हमें विद्युत्चुम्बकीय तरंगे मिलती हैं। हमने अप्रगामी तरंगों को क्यों माना? तो इसके लिए हम कह सकते हैं कि सतह पर विद्युत्चुम्बकीय तरंगों के नोड होंगे और कोई एंटीनोड नहीं होगा। नोड उन बिन्दुओं को कहते हैं जहाँ तरंग का विस्तापन शून्य होता है। इस तरह सतह के हर तरफ नोड बनेगा। चूँकि यदि यहाँ बनने वाली विद्युत्चुम्बकीय तरंगों से सम्बद्ध विद्युत् क्षेत्र सतह के समान्तर होता है और उस अवस्था में इलेक्ट्रॉनों की गति होगी और हमें विद्युत धारा प्राप्त होगी। अतः इस अवस्था से बचने का एक ही तरिका है कि यह विद्युत् क्षेत्र शून्य हो। अब सतह के हर ओर यदि नोड है तो यह ठीक उसी तरह का उदाहरण है जब हम एक रस्सी को दो तरफ से बांध दें। उस अवस्था में रस्सी में हमें केवल अप्रगामी तरंगे देखने को मिलेंगी। अतः पहला अभिगृहित अप्रगामी तरंगों के रूप में माना गया। अब हम दूसरे अभिगृहित को समझें, तो उसमें समविभाजन प्रमेय को माना गया है कि गुहा के अन्दर बनने वाली विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की कुल औसत ऊर्जा को समझ सकें। समविभाजन प्रमेय के अनुसार किसी अणु की इकाई स्वातंत्रय कोटि की  औसत गतिज ऊर्जा का मान kT/2 होती है। यह प्रत्येक अणु की प्रत्येक स्वतंत्र विधा की कुल औसत गतिज ऊर्जा kT/2 है। इसे सूत्र के रूप में हम Eav = 2×kT/2 = kT होगा। यहाँ पर सूत्र में kT/2 ऊर्जा का मान है और उसको 2 से इसलिए गुणा किया गया है क्योंकि जब भी हम सरल आवृत्त गति का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि कुल औसत ऊर्जा का मान कुल औसत गतिज ऊर्जा से दो गुणा होता है। अतः यहाँ Eav कुल औसत ऊर्जा को निरूपित करता है। अतः यहाँ पर प्रत्येक अप्रगामी तरंग की औसत ऊर्जा kT होती है। अतः अब हम रेले-जीन्स के नियम का प्रतिपादन का प्रयास करते हैं।

सबसे पहले हम अप्रगामी तरंगों का गुहा के अन्दर घनत्व को समझते हैं। यदि इसे हम N(ν)dν लिखें तो हमें N(ν)dν = (8πν2/c3)dν प्राप्त होती है। यह एक महत्त्वपूर्ण व्युत्त्पति है जो आप किसी भी पाठ्य पुस्तक में देख सकते हैं। हमारा सुझाव यह रहेगा कि आपको इसे व्युत्पन्न करना चाहिए। अब हम दूसरे नियम के अनुसार देखें तो प्रत्येक अप्रगामी तरंग के अनुसार कुल औसत ऊर्जा Eav = kT लिखते हैं। अतः गुहा के अन्दर ऊर्जा घनत्व का मान गुहा में अप्रगामी तरंगों का घनत्व और एक अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा के गुणनफल के बराबर होगी। अतः सूत्रिय रूप में uνdν = (8πν2/c3) dν × kT = (8πν2kT/c3)dν लिख सकते हैं। यह आवृत्ति के रूप में हमें रेले-जीन्स का नियम प्राप्त होता है। चूँकि c = νλ अतः dν = -(c/λ2)dλ और uλdλ = (8πkT/λ4)dλ प्राप्त होता है जिसे हम रेले-जीन्स विकिरण नियम का तरंगदैर्घ्य के रूप में सूत्र कह सकते हैं।

जैसे हमने वीन विकिरण नियम में देखा ठीक उसी तरह यदि रेले-जीन्स के लिए भी वर्णक्रम से तुलना करें तो ज्ञात होता है कि रेले जीन्स नियम उच्च तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए सत्य प्राप्त होता है लेकिन तरंगदैर्घ्य के निम्न मानों के लिए यह सुम्मेलित नहीं होता और प्रायोगिक मानों को समझाने में अक्षम रहता है। अतः उच्च तरंगदैर्घ्य मानों के लिए यह प्रायोगिक मानों को समझाने में सफल रहता है। ठीक इसी तरह यदि इसे आवृत्ति के रूप में देखें तो रेले जीन्स का नियम निम्न आवृत्ति मानों के लिए वर्णक्रम के तुल्य पाया जाता है लेकिन उच्च आवृत्ति मानों के लिए रेले जीन्स का नियम असफल रहता है। इस तरह से हम पाते हैं कि चिरसम्मत यांत्रिकी यहाँ पर असफल रहती है और कृष्णिका विकिरण को समझाने में असफल रहती है। इस असफलता को एक विशिष्ठ नाम दिया गया जिसे हम पराबैंगनी विपद भी कहते हैं।

चिरसम्मत यांत्रिकी की असफलता को हम पराबैंगनी विपद के नाम से जानते हैं जिसे अंग्रेज़ी में अल्ट्रावॉयलेट कैटास्ट्रोप कहा जाता है। यहाँ पर हम पराबैंगनी विपद क्यों कहते हैं? यह समझने के लिए हम कृष्णिका विकिरण वर्णक्रम को देखें तो ज्ञात होता है कि अधिकतम तीव्रता से कम तरंगदैर्घ्य वालों के निकट हमें दृश्य क्षेत्र प्राप्त होता है, उससे अधिक तरंगदैर्घ्य के लिए हमें अवरक्त क्षेत्र और उससे कम तरंगदैर्घ्य के लिए हम पराबैंगनी तरंग क्षेत्र कहते हैं। लेकिन उपरोक्त विवेचना के अनुसार जब हम दृश्य क्षेत्र से पराबैंगनी क्षेत्र में जाते हैं तो रेले-जीन्स नियम असफल हो जाता है अतः इसे हम पराबैंगनी विपद कहते हैं। यहाँ पर हम दो अन्य बिन्दू देखते हैं। सूत्र में हमें uν ∝ ν2 प्राप्त होता है तथा किसी अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा kT प्राप्त होती है। इसके अनुसार गुहा में स्थित इलेक्ट्रॉनों के तापीय उत्सर्जन के दौरान उनकी आवृत्ति क्या सम्भव है? इन इलेक्ट्रॉनों की आवृत्ति बहुत कम से बहुत अधिक तक कुछ भी सम्भव है। अर्थात् इलेक्ट्रॉन लघु से दीर्घ और मध्यम मान की कोई भी आवृत्ति रख सकता है और यह सतत हो सकती है। अतः जब इलेक्ट्रॉन विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को कोई भी आवृत्ति दे सकता है। चिरसम्मत यांत्रिकी के अनुसार यह कोई भी सतत ऊर्जा विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को दे सकता है और चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार यह ऊर्जा स्थानान्तरण को सतत भी रख सकता है। इसके अतिरिक्त सभी अलग अलग आवृत्ति की अप्रगामी तरंगों की कुल औसत ऊर्जा kT होगी क्योंकि अलग-अलग आवृत्ति के इलेक्ट्रॉन गुहा में अलग-अलग आवृत्ति की विद्युत्चुम्बकीय तरंगे उत्पन्न करते हैं और वो अलग-अलग विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की औसत ऊर्जा समान रूप से kT है। हमने जो दो बिन्दू चिरसम्मत भौतिकी के लिए लिखा है, वो दोनों गलत हैं। इसी तरह uν ∝ ν2  से भी हम समझ सकते हैं कि आवृत्ति के बढ़ने पर ऊर्जा घनत्व भी बहुत अधिक बढ़ना चाहिए लेकिन किसी भी तापमान पर तापीय विकिरणों का घनत्व अनन्त की ओर अग्रसर नहीं हो सकता और यह परिणाम भी असम्भव था। इसी को हमने पराबैंगनी विपद नाम दिया है।

अब हम चिरसम्मत यांत्रिकी के अच्छे प्रयासों का अध्ययन कर चुके हैं और हमने पाया कि पूर्ण वर्णक्रम को कोई भी चिरसम्मत नियम समझाने में असफल रहा अतः प्लांक नियम को समझेंगे। मैक्स प्लांक जर्मन भौतिक विज्ञानी थे और कहा जाता है कि वो विद्युत् बल्ब की दक्षता बढ़ाने के लिए काम कर रहे थे। आजकल बल्ब का प्रयोग बहुत सीमित हो गया है लेकिन कुछ वर्ष पूर्व तक काम में लिया जाने वाला बल्ब कृष्णिका के रूप में विकिरण उत्सर्जन करता है और इसका बहुत छोटा भाग दृश्य क्षेत्र में आता है। आजकल प्रयुक्त एलईडी बल्ब और सीऍफ़एल का सिद्धान्त अलग है लेकिन सामान्य बल्ब उच्च ऊर्जा पर गर्म होकर प्रकाश उत्सर्जित करता था और हमें दृश्य प्रकाश देता था। जब बल्ब उच्च तापमान पर गर्म होता है तब उसके तन्तु का तापमान लगभग 3000 केल्विन होता है। अर्थात् पूर्ण तापमान पर यह बल्ब बहुत अधिक मात्रा में गर्म होता था और फिर भी हमें बहुत कम तीव्रता के साथ प्रकाश उपलब्ध होता था। इसको हम कृष्णिका वर्णक्रम से समझ सकते हैं। उसमें हमें दृश्य क्षेत्र में बहुत कम क्षेत्र प्राप्त होता है और ऊर्जा का अधिकतर भाग बेकार जाता था जो हमें दृश्य प्रकाश नहीं देता। अतः इसकी दक्षता बढ़ाने के लिए दृश्य प्रकाश के क्षेत्र को बढ़ाना आवश्यक था। ऐसा कहा जाता है कि प्लांक को कुछ शोध प्रणेताओं ने इसकी दक्षता बढ़ाने का कार्य दिया। इसके लिए प्लांक ने सबसे पहले कृष्णिका विकिरण के मूल सिद्धान्त को समझने का प्रयास किया। प्लांक ने इस तरह से इस समझ को विकसित किया कि दुनिया ही बदल दी। जो चिरसम्मत भौतिकी हमें सम्पूर्ण लगती थी उसका पहली असफलता वैज्ञानिकों के सामने आया। सबसे पहले प्लांक ने क्या किया। इसका अर्थ यह नहीं कि चिरसम्मत भौतिकी की यह सफलता भौतिकी के विकास में कोई योगदान नहीं, ऐसा बिलकुल गलत होगा। भौतिकी के विकास में चिरसम्मत भौतिकी का बहुत बड़ा योगदान रहा है, जरूरी नहीं कि हर वैज्ञानिक का सफल प्रयोग ही हमारे काम में आये, बल्कि असफल प्रयोग भी आगे के प्रयोग विकसित करने में सहायक होस सकता है। प्लांक ने सबसे पहले रेले-जीन्स विकिरण नियम में कमीयों को समझने का प्रयास किया। जैसा कि हम उपर देख चुके हैं ऊर्जा घनत्व का मान गुहा में अप्रगामी तरंगों के घनत्व और किसी अप्रगामी तरंग की औसत ऊर्जा के गुणनफल के तुल्य है। प्लांक के अनुसार अप्रगामी तरंगों के घनत्व में कोई समस्या नहीं है लेकिन उनकी कुल औसत ऊर्जा की गणना में एक बड़ी समस्या है। प्लांक के अनुसार गुहा में स्थित अलग अलग आवृत्ति की अप्रगामी तरंगों की ऊर्जा समान कैसे हो सकती है? इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रेक्षित किया कि कुल औसत ऊर्जा का सूत्र Eav = kT भी कुछ अशुद्धता रखता है। क्योंकि उन्होंने पाया कि निम्न ऊर्जा मानों के लिए रेले-जीन्स का नियम सही है लेकिन उसके साथ समस्या अधिक आवृत्ति मानों के लिए गलती है। अतः उन्होंने पाया कि औसत ऊर्जा का मान निम्न आवृत्ति के मानों के लिए kT को अग्रसर होना चाहिए लेकिन उच्च आवृत्ति मानों के लिए यह शून्य की और अग्रसर होना चाहिए। अतः औसत ऊर्जा को आवृत्ति का फलन होना चाहिए। अर्थात् Eav = f(ν) होना चाहिए। जबकि पहले के अनुमान में यह मान kT के रूप में नियत था जो आवृत्ति पर निर्भर नहीं था। प्लांक ने इसके अतिरिक्त पाया कि जो दोलित्र (यहाँ पर इलेक्ट्रॉन) भिन्न भिन्न आवृत्ति से दोलन कर रहे हैं और लेकिन विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को सतत ऊर्जा दे रहे हैं जो सम्भव नहीं है। यदि हमें ऐसा कोई सिद्धान्त प्रतिपादित करना है जो प्रायोगिक वर्णक्रम को समझा सके, उसके लिए आवश्यक है कि दोलित्र से विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को ऊर्जा का आदान प्रदान विविक्त होना चाहिए और यह सतत नहीं होना चाहिए अर्थात् यह क्वांटिकृत होना चाहिए और इसके लिए हम प्लांक क्वांटीकरण नियम का अध्ययन कर रहे हैं। उनके अनुसार ऊर्जा का मान 0, ΔE, 2ΔE, 3ΔE ... के रूप में होना चाहिये। यह चिरसम्मत यांत्रिकी से एकदम भिन्न है जिसके अनुसार किसी भी ऊर्जा की विद्युत्चुम्बकीय तरंग प्राप्त हो सकती है। लेकिन यहाँ पर ऊर्जा के सतत मान नहीं हैं और यह टुकड़ों के रूप में स्थानान्तरित हो रही है। अर्थात् यह मान या तो ΔE होगी, या फिर ये 2ΔE होगी या फिर ये 3ΔE स्थानान्तरित होगी। यहाँ पर निम्नतम ऊर्जा ΔE का मान आवृत्ति ν के अनुक्रमानुपाती होती है और इसे हम ΔE = hν लिख सकते हैं। यहाँ पर यह h प्लांक नियतांक के रूप में जाना जाता है। प्लांक ने अपने सैदान्तिक अध्ययन से h का मान भी प्रेक्षित किया। उन्होंने प्रायोगिक परिणामों को सुम्मेलित करने का प्रयास करते हुये इस नियतांक का मान ज्ञात किया। ये परिणाम प्लांक ने असफल सिद्धान्तों को पढ़कर ये परिणाम निकाले। अतः विज्ञान के विद्यार्थी होने के नाते आपको असफलता और सफलता को अलग अलग नहीं देखना चाहिए। ये केवल प्रयोग होते हैं और ये असफल प्रयोग भी प्लांक के प्रयोग को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रखता है यह हमें ध्यान रखना चाहिए।

अब हम प्लांक के विकिरण नियम का अध्ययन करेंगे। उपरोक्त नियम प्लांक का क्वांटीकरण नियम था। प्लांक के क्वांटिकरण नियम के अनुसार E = 0, ΔE, 2ΔE, 3ΔE, ... जहाँ Δ ν है जिसे हम ΔE = hν लिख सकते हैं जहाँ h प्लांक नियतांक है और हम E = nhν लिख सकते हैं। यहाँ n कोई पूर्णांक संख्या है। अब यहाँ से हम प्लांक के क्वांटिकरण को इस सूत्र से दे सकते हैं। प्लांक नियतांक का मान 6.62×10-34 जूल-सैकण्ड होती है। यह एक सार्वत्रिक नियतांक है जिसका एसआई मात्रक जूल-सैकण्ड है। अब इसके आधार पर प्लांक ने E = nhν से अप्रगामी तरंगों के लिए एक तरंग की कुल औसत ऊर्जा ज्ञात की जिसका सूत्र Eav = hν/(exp(hν/kT) - 1 ) प्राप्त किया। यह दूसरी उत्पत्ति है जो हमने आपके लिए छोड़ी है। यह आप किसी भी स्नातक स्तर की पाठ्य पुस्तक में पा सकते हैं। यह एक बहुत ही सुन्दर व्यंजक है और आपको इसे हल करना चाहिए। चूँकि यहाँ E के मान किसी दोलित्र के लिए hν है, किसी के लिए 2hν तो किसी के लिए 3hν और किसी के लिए nhν है। इन सभी का औसत मान उपरोक्त सूत्र में लिखे अनुसार प्राप्त होता है। अतः औसत ऊर्जा के सूत्र से इसे ज्ञात किया जा सकता है। अब हम इस ऊर्जा सूत्र को रेले जीन्स के नियम में रखकर देखते हैं। अब तक हमने प्लांक का क्वांटिकरण नियम देखा। अब हम प्लांक के विकिरण नियम का अध्ययन करते हैं जिसे अंग्रेज़ी में प्लाक्ज़ रेडियेशन लॉ कहते हैं। पुनः हम गुहा में ऊर्जा घनत्व को गुहा में अप्रगामी तरंगों के घनत्व और एक अप्रगामी तरंग की कुल औसत ऊर्जा के गुणनफल के रूप में लिखते हैं तो हमें सूत्र uν = (8πν2/c3)(hν/(exp(hν/kT)-1) लिख सकते हैं जिसमें प्रथम पद रेले जीन्स नियम से सीधा उधार लिया है लेकिन यहाँ दूसरे पद में रेले जीन्स की ऊर्जा kT के स्थान पर प्लांक क्वांटिकरण नियम से ली गयी है। अतः परिणामी सूत्र हमें uν = (8πhν3/[c3(exp(hν/kT)-1))] प्राप्त होता है। आप इस सूत्र को तरंगदैर्घ्य के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं। यह आपके लिए गृह कार्य है, आप इसे तरंगदैर्घ्य के रूप में परिवर्तित कर सकते हैं जिसमें आवृत्ति के पदों में प्लांक के विकिरण नियम को तरंगदैर्घ्य के पदों में प्राप्त कर सकते हैं जिसके लिए आपको तरंगदैर्घ्य और आवृत्ति में सम्बन्ध को याद रखना पड़ेगा। अब यहाँ देखा जा सकता है कि यह नियम आश्चर्यजनक रूप से एक ऐसा सैद्धान्तिक नियम है जो कृष्णिका विकिरण के पूर्ण प्रायोगिक वर्णक्रम को समझाने में सफल रहता है। इसके लिए आप निम्नलिखित ग्राफ़ देख सकते हैं:


यहाँ उपरोक्त चित्र में प्लांक विकिरण नियम और प्रायोगिक वर्णक्रम एक दूसरे को पूर्णतः अतिव्यापी करते हैं। यह नियम वीन के नियम और रेले-जीन्स के नियम की तरह उच्च आवृत्ति अथवा निम्न आवृत्ति को समझाने वाले नहीं है बल्कि यह पूर्ण वर्णक्रम को पूर्णतः समझाने में सफल रहा। प्लांक के इस नियम की सफलता के साथ ही इसने भौतिकी में क्वांटम यांत्रिकी के रूप में नया पथ प्रदर्शित करने किया और न्यूनतम ऊर्जा के टुकड़ों के रूप में ऊर्जा के क्वांटा से ही हमें ज्ञात हुआ कि ऊर्जा का स्थानान्तरण सतत न होकर विविक्त होता है जैसा हमने दोलित्र से विद्युत्चुम्बकीय तरंग में स्थानान्तरण के रूप में देखा। प्लांक का यह कार्य इतना अधिक महत्त्वपूर्ण था कि मैक्स प्लांक को 1918 में भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मैक्स प्लांक जर्मनी से थे अतः जर्मनी में प्लांक के नाम पर एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण शोध संस्थान है जिसका नाम प्लांक रिसर्च सोसाइटी है। प्लांक इस नये सिद्धान्त के प्रथम अन्वेषक हैं। वो इस सिद्धान्त के पितामह भी कहे जा सकते हैं।


अब आगे हम कुछ और चर्चा करते हैं जो आपके गृह कार्य से सम्बंधित है। हम प्लांक विकिरण नियम की चर्चा करते हैं। 

  1. प्लांक के विकिरण नियम की सहायता से निम्न तरंगदैर्घ्य क्षेत्र में वीन के नियम को व्युत्पन्न कीजिए। यह कार्य उपर किया जा चुका है जिसमें कहा गया था कि औसत ऊर्जा निम्न ऊर्जा क्षेत्र में kT और उच्च ऊर्जा क्षेत्र में शून्य होनी चाहिए।
  2. प्लांक के विकिरण नियम की सहायता से उच्च तरंगदैर्घ्य क्षेत्र में रेले-जीन्स नियम को व्युत्पन्न कीजिए। 

ये दो प्रश्न आपके गृह कार्य में हैं इससे पहले हमने आपको दो सूत्र व्युत्पन्न करने के लिए दिये हैं जिसमें अप्रगामी तरंगों के लिए ऊर्जा घनत्व का मान ज्ञात करना और प्लांक दोलित्र के लिए औसत ऊर्जा ज्ञात करना शामिल है। इसप्रकार आपके लिए चार प्रश्न गृह कार्य के रूप में छोड़े हैं।

उपरोक्त विषय की वीडियो के रूप में व्याख्या के लिए निम्नलिखित वीडियो देखें:




Sunday, August 30, 2020

कृष्णिका विकिरण

पिछले ब्लॉग में हमने चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में अध्ययन किया और इस ब्लॉग में हम कृष्णिका विकिरण के बारे में लिख रहे हैं। 

कृष्णिका विकिरण तापीय विकिरण होते हैं। किसी वस्तु के स्वयं के तापमान के कारण उत्सर्जित होने वाली विकिरणों को हम तापीय विकिरण कहते हैं। कृष्णिका विकिरण भी एक तरह की तापीय विकिरण ही होती हैं। इसके बारे में वर्ष 1792 में ब्रितानी वेजवूड पोर्सेलिन निर्माता थॉमस वेजवूड ने दिया था। उन्होंने अपने चुल्हे में यह प्रेक्षित किया था कि वो जिस वस्तु को भी गर्म करते हैं वो लाल रंग की हो जाती है। उनके द्वारा दिये गये नियम के अनुसार सभी वस्तुयें सभी तापमानों पर तापीय विकिरणों का उत्सर्जन करती हैं। अर्थात् मैं (लिखने वाला) और आप (पाठक) भी इस समय विकिरणों का उत्सर्जन कर रहे हैं। इसके अलावा हमारे आसपास की सभी वस्तुयें तापीय विकिरणों को उत्सर्जित कर रही हैं। हमें सभी तापीय विकिरणें दिखाई नहीं देती और जो हमें दिखाई देती हैं उनका तरंगदैर्घ्य लगभग 4000 Å से 7000 Å तक होता है जिसे दृश्य प्रकाश कहा जाता है। सामान्य ताप पर किसी भी वस्तु से उत्सर्जित तरंगों का न्यूनतम तरंगदैर्घ्य लगभग 9500 Å होता है जो अवरक्त क्षेत्र से सम्बंधित होती हैं। यदि हम किसी वस्तु का तापमान बढ़ाते हैं और यह तापमान 1100 K (केल्विन) तक लेकर जाते हैं तो वह वस्तु लाल दिखाई देने लगती है। जब यह तापमान लगभग 3000 K के लगभग हो जाता है तो यह श्वेत-पीली रंग की दिखाई देने लगती है। उदाहरण के लिए आपने लुहार को लौहे को गर्म करते देखा होगा।

कृष्णिका उस वस्तु को कहते हैं जो इसपर गिरने वाले सभी तरह की विकिरणों को अवशोषित करने में सक्षम हो। अर्थात् अवशोषण में विकिरण के तरंगदैर्घ्य, आवृत्ति अथवा आगमन के कोण पर निर्भरता नहीं होती। यह एक तरह से ऐसी विशिष्ट वस्तु होती है जिसपर गिरने वाली विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है और इसका किसी तरह का परावर्तन नहीं होता। यदि किसी सामान्य वस्तु पर कोई कोई विकिरण आपतित होती है तो सम्भावित घटानाओं में परावर्तन, अवशोषण और पारगमन (इसमें अपवर्तन भी) शामिल है। यदि इन तीनों की प्रायिकता क्रमश r, a और t हो तो r + a + t = 1 प्राप्त होगा क्योंकि कुल प्रायिकता एकांक ली जाती है। यदि हम कृष्णिका की बात करें तो केवल अवशोषण की बात करते हैं अर्थात् r = 0 और  t = 0 है अतः a = 1 प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त कृष्णिका विकिरण के लिए हम एक अन्य नियम की चर्चा करते हैं जिसे किरचॉफ़ का नियम कहते हैं जिसके अनुसार अच्छे अवशोषक अच्छे उत्सर्जक होते हैं। अर्थात् eλ/aλ नियत होता है जहाँ eλ उत्सर्जन क्षमता और aλ  अवशोषण क्षमता को निरूपित करते हैं। तापीय साम्य अवस्था पर कृष्णिका के लिए eλ का मान इकाई होता है अतः उपरोक्त नियम के अनुसार aλ का मान भी इकाई होगा। इस तरह से हम समझ सकते हैं कि कृष्णिका को हम यह नाम क्यों देते हैं। चूँकि सामान्य तापमान पर हम किसी वस्तु को देखने के लिए उससे परावर्तित विकिरणों से देखते हैं लेकिन कृष्णिका किसी भी ताप पर किसी तरह का परावर्तन नहीं करती और अतः हम इसे कृष्णिका कहते हैं। कमरे के ताप पर यह काले रंग की दिखाई देती है लेकिन सभी तापमानों पर इसका काला दिखाई देना आवश्यक नहीं है जिसके सामान्य उदाहरणों में सूर्य और सामान्य बल्ब हैं जो तापीय नियम से हमें रोशनी देते हैं।

एक प्रायोगिक कृष्णिका का निर्माण करने के लिए हम एक खोखला गोला लेते हैं जिसके किसी एक स्थान पर एक छोटा सा छिद्र कर देते हैं। इस छिद्र का आकार गोले की तुलना में नगण्य है। गोले को आन्तरिक भाग को काले रंग कर दिया जाता है। चूँकि काले रंग को अच्छा अवशोषक माना जाता है। अब यदि कोई विकिरन उस छिद्र पर आपतित होगी तो वो गोले के अन्दर चली जायेगी जिससे गोले के अन्दर उस विकिरण के कुछ परावर्तन होंगे। चूँकि गोले के आन्तरिक भाग को काला किया गया है अतः परावर्तन की मात्रा बहुत कम होगी और उत्तरोत्तर प्रावर्तनों के पश्चात् विकिरण अवशोषित हो जाती है। गोले पर बने छिद्र को बाहर से देखने पर ज्ञात होता है कि उससे टकराने वाले विकिरण पूर्णतः अवशोषित हो जाती है अतः यह छिद्र कृष्णिका का काम करता है। ध्यान रहे पूरा गोला कृष्णिका नहीं है और उसपर आपतित किरणें परावर्तन भी प्रदर्शित करता है। अतः यहाँ कृष्णिका के रूप में केवल गोले पर बने छिद्र को कहा जाता है।


यदि हम कृष्णिका का अध्यन किसी वर्णक्रममापी के साथ किसी एक निश्चित तापमान पर करें तो हमें ज्ञात होगा कि इससे उत्सर्जित विकिरणों की तीव्रता का एक निश्चित वर्णक्रम होगा जो तरंगदैर्घ्य में वृद्धि के साथ पहले शिथिलतः बढ़ता है और एक निश्चित मान के बाद वो पुनः कम होने लग जाता है जो अनन्त तरंगदैर्घ्य पर शून्य की तरफ अग्रसर होता है। किसी अन्य तापमान (जो पहले वाले से अधिक है) पर भी यह कुछ इसी तरह का होता है लेकिन इसके अधिकतम तीव्रता का मान बढ़ जाता है जो कम तरंगदैर्घ्य पर दिखाई देता है। यह वर्णक्रम कृष्णिका के पदार्थ पर निर्भर नहीं करता। यह वर्णक्रम का आरेख सतत होता है जो यह प्रदर्शित करता है कि हमें सभी तरंगदैर्घ्य के मानों के लिए वर्णक्रम प्राप्त होता है। यहाँ तीव्रता के अधिकतम मान पर स्थित तरंगदैर्घ्य और तापमान में एक निश्चित सम्बन्ध होता है। यह तरंगदैर्घ्य का मान तापमान के व्युत्क्रमानुपाती होता है। अर्थात λmaxT = b होता है जहाँ b वीन नियतांक है। इस नियम को वीन विस्थापन नियम कहते हैं। इसी तरह कुल उत्सर्जन क्षमता मान ताप की चतुर्थ घात के समानुपाती होती है जिसे स्टीफन वोल्ट्समान का नियम कहते हैं।


उपरोक्त नियमों को एक साथ निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है:

  1. कृष्णिका विकिरण का मान केवल तापमान पर निर्भर करता है।
  2. कृष्णिका विकिरण का आरेख सतत होता है।
  3. कृष्णिका विकिरण की तीव्रता का मान शून्य तरंगदैर्घ्य से आरम्भ होती है और तरंगदैर्घ्य का मान बढ़ने के साथ बढ़ती है। एक निश्चित तरंगदैर्घ्य पर यह अधिकतम पर पहुँचने के पश्चात् पुनः कम होने लग जाता है।
  4. अधिकतम तीव्रता की स्थिति में इससे उत्सर्जित ऊर्जा का मान तापमान की पंचम घात के समानुपाती होती है।
  5. कुल उत्सर्जन क्षमता उपरोक्त के समाकलन से ज्ञात होती है जो तापमान के चतुर्थ घात के समानुपाती होती है।

अधिक दृश्य प्रभावों के साथ इसे देखने के लिए निम्नलिखित विडियों को देखा जा सकता है:



Tuesday, August 25, 2020

क्वांटक यांत्रिकी: चिरसम्मत भौतिकी का एक परिचय

क्वांटम यांत्रिकी आज चिकित्सा से लेकर अभियांत्रिकी के सभी विषयों में प्रयुक्त होती है। हमें क्वांटम यांत्रिकी को समझने से पहले यह समझना चाहिए कि हमें इसकी जरूरत क्यों पड़ी और उसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि हम चिरसम्मत यांत्रिकी को समझें। अतः यह ब्लॉग चिरसम्मत यांत्रिकी के बारे में चर्चा के लिए लिखा गया है।

चिरसम्मत भौतिकी को हम तीन भागों में विभक्त करते हैं: 

  1. चिरसम्मत यांत्रिकी,
  2. चिरसम्मत विद्युत्गतिकी और
  3. उष्मागतिकी
सबसे पहले हम इसके सभी नियमों को समझने का प्रयास करते हैं:

  1. चिरसम्मत यांत्रिकी की शुरूआत हम न्यूटन की गति के नियमों से आरम्भ करते हैं जिसमें बाद में लाग्रांजियन और हैमल्टोनियन को शामिल कर लेते हैं जो हमें ज्यादा अच्छे से सूत्रित करके समस्याओं को हल करने में सहायता प्रदान करते हैं। इसमें हम कण अथवा वस्तु की गति, दृढ़ पिंड, बल, बलाघूण, जड़त्व के नियम आदि का अध्यन करते हैं। 
  2. विद्युत्गतिकी को हम मैक्सवेल समीकरणों से उल्लिखित करते हैं। मूलतः हम चार मैक्सवेल समीकरणों का अध्ययन करते हैं जो हमें कणों की गति, विद्युत और चुम्बकीय क्षेत्र और उनकी अन्योन्य क्रियायें और इन क्षेत्रों का दिक्-काल में परिवर्तन।
  3. उष्मागतिकीय नियम और मैक्सवेल वोल्ट्समान सांख्यिकी इसको समझाने के लिए काम में लिए जाते हैं। इसमें हम उष्मा, कार्य और किसी निकाय के औसत व्यवहार का अध्ययन करते हैं। यहाँ निकाय को हम कणों के समाहार के रूप में देखते हैं।
चिरसम्मत भौतिकी एक निश्चियात्मक सिद्धान्त है जबकि क्वांटम यांत्रिकी एक प्रायिकता आधारित सिद्धान्त है। हम इस वाक्य को सरल शब्दों में एक उदाहारण देकर समझा सकते हैं। जैसे हम एक कण को समझने का प्रयास करते हैं जिसकी प्रारम्भिक अवस्थायें हमें ज्ञात हैं जिनमें कण का द्रव्यमान, उसकी प्रारम्भिक अवस्था r = r0, प्रारम्भिक वेग v = u और इस कण पर कार्य करने वाले बल F = F0 शामिल हैं। अर्थात हमें कण की सभी प्रारम्भिक अवस्थाओं का ज्ञान है। अतः हम न्यूटन की गति के नियम अथवा लाग्रांजियन अथवा हैमल्टोनियन की सहायता से इस कण के भविष्य को सुपरिषित कर सकते हैं और इसकी भविष्य में स्थिति को यथार्थता के साथ बताना सम्भव है जिसे गणितीय रूप में कण का बिन्दुपथ कहते हैं। अतः चिरसम्मत यांत्रिकी में हमें यदि प्रारम्भिक अवस्थायें ज्ञात हों तो हम भविष्य को जान सकते हैं। चिरसम्मत यांत्रिकी के अनुसार कण और तरंग दो एकदम अलग रूप में मानती है अर्थात् कोई कण कभी तरंग नहीं हो सकता और कोई तरंग कभी कण नहीं हो सकती। उदाहरण के लिए हम इन्हें दो ऐसे समुच्चय मान सकते हैं जिनके अन्तर्वेशित अथवा प्रतिच्छेदन समुच्चय के रूप में केवल खाली समुच्चय दिया जा सकता है। हम कण और तरंगों में कुछ अन्तर को समझने का प्रयास करते हैं:
  1. कण के पास द्रव्यमान, ऊर्जा और संवेग होता है जबकि तरंग के पास केवल ऊर्जा और संवेग होता है।
  2. कण केवल टक्कर कर सकते हैं लेकिन तरंगे व्यतिकरण, विवर्तन, परावर्तन अथवा अपवर्तन कर सकती हैं।
अर्थात कण कभी व्यतिकरण की घटना नहीं दिखायेंगे वैसे ही तरंगों के मध्य टक्कर नहीं होंगी। इस तरह से जो घटनायें कण और तरंग के लिए हैं वो अलग अलग हैं।

उपरोक्त विषय को दृश्य प्रभावों और प्रभावी रूप में समझने के लिए कृपया निम्नलिखित वीडियो देखें: https://youtu.be/tun5TKXSe0M


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