Sunday, May 16, 2021

प्रकाश विद्युत प्रभाव और आइंस्टीन की व्याख्या

    नमस्कार, क्वांटम यांत्रिकी के ब्लॉग पर आपका स्वागत है। यह इस विषय पर चौथा ब्लॉग है। यह ब्लॉग प्रकाश विद्युत् प्रभाव पर है। यह भौतिकी का इतना महत्त्वपूर्ण विषय है कि इसे छोटी कक्षाओं में पढ़ाना आरम्भ किया जाता है और बाद में स्नातक, परास्नातक और शोध तक लगातार चलता है। आजकल हमारे चारों तरफ जो भी सौर ऊर्जा के संयत्र देखते हैं अथवा भौतिकी के विभिन्न समूहों को सौर सेल पर काम करते देखते हैं, वो सभी भी प्रकाशविद्युत् प्रभाव जैसी ही तकनीकी, प्रकाशविभव प्रभाव पर आधारित होती है। इस तरह से इसके विभिन्न अनुप्रयोग हैं जिसपर बहुत अधिक कार्य चल रहा है। प्रत्येक ब्लॉग की तरह इसमें भी हम इतिहास से आरम्भ करेंगे, अर्थात् इसपर जिन वैज्ञानिकों ने काम किया उसका अध्ययन। उसके बाद हम इसके प्रायोगिक परिणामों का अध्ययन करेंगे जिसमें सम्बंधित उपकरणों के प्रेक्षण और परिणाम क्या रहे। इसके पश्चात् हम चिरसम्मत भौतिकी की असफलताओं का अध्ययन करेंगे जो हमें यह समझने में सहायक होगा कि चिरसम्मत भौतिकी प्रकशविद्युत् प्रभाव को समझाने में कैसे असफल रही। आखिर में हम महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के प्रकाशविद्युत् प्रभाव पर व्याख्या का अध्ययन करेंगे।

प्रकाश विद्युत् प्रभाव का इतिहास अथवा पृष्ठभूमि

    जैसा कि हम जानते हैं कि मैक्सवैल ने विद्युत्गतिकि में चार मूलभूत समीकरण दिये थे जिन्हें हम उनके सम्मान में मैक्सवेल समीकरण कहते हैं। इन समीकरणों के आधार पर मैक्सवेल ने बताया कि विद्युत्चुम्बकीय तरंगे c (प्रकाश की गति) गति से चलती है और एक तरंग रूप रखती है। मैक्सवैल का सिद्धान्त पूर्णतः सैद्धान्तिक था और इसी को समझने के लिए हर्ट्ज़ नामक वैज्ञानिक 1887 में प्रयोग कर रहे थे। हर्ट्ज़ वो वैज्ञानिक हैं जिन्होंने मैक्सवेल के विद्युत्चुम्बकीय सिद्धान्त प्रायोगिक रूप से सिद्ध किया था। हर्ट्ज़ ने अपने प्रयोग में कुछ धातु की गोलों को विपरीत ध्रुवता की वोल्टता से जोड़ रखा था और उनके बीच में खाली स्थान रखा था अर्थात उच्च वोल्टता के साथ जुड़े हुये दोनों धात्विक गोले एक दूसरे से कुछ दूरी पर स्थित थे। उच्च ऊर्जा पर दोनों गोलों के मध्य चिंगारी उत्पन्न होती है। हर्ट्ज़ ने ये प्रयोग करते हुये पाया कि इन दोनों धात्विक गोलों के मध्य चिंगारी उत्पन्न होना सामान्य प्रयोग है लेकिन नकारात्मक ध्रुवता से जुड़े धातु के गोले पर यदि पराबैंगनी किरणें डाली जाती हैं तो चिंगारी की तीव्रता बढ़ जाती है। पराबैंगनी किरणों से चिंगारी की तीव्रता क्यों बढ़ जाती है, हर्ट्ज़ इसकी व्याख्या नहीं कर पाये और उन्होंने इस काम को आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन हर्ट्ज़ के दो सहायक थे जिनका नाम हॉलवाच और लिनार्ड। इन दोनों ने इस प्रयोग को आगे बढ़ाया और इसका प्रणालीगत प्रायोगिक अध्ययन किया। इसके लिए एक प्रयोग निर्मित किया और इसके परिणामों को लिखकर अध्ययन किया। अतः हम प्रयोगिक परिणामों का अध्ययन करते हैं। अतः अगला भाग प्रायोगिक परिणाम होगा।

प्रायोगिक परिणाम

    हॉलवाच और लिनार्ड ने प्रायोगिक व्यवस्था की जिसमें दो धातु की पत्तियाँ लगायी। एक पत्ती को नकारात्मक और दूसरी पत्ती को धनात्मक विभव से जोड़ा। विभव देने के लिए समायोजक बैटरी, एक अमीटर और एक वोल्टमीटर काम में लिया। समायोजक बैटरी एक ऐसी बैटरी है जिसमें विभवान्तर को हम नियंत्रित कर सकते हैं, अमीटर से परिपथ में धारा का मापन और वोल्टमीटर से दोनों प्लेटों के मध्य विभवान्तर का मापन किया गया। दोनों धातु की पत्तियों को एक निर्वातित काँच की नली में बन्द कर दिया। यहाँ निर्वातित का अर्थ काँच की नली में अधिकतम सम्भव निर्वात करने से है, अर्थात् उसमें उपस्थित हवा का घनत्व कम से कम किया जाता है। यहाँ नकारात्मक धातु की पत्ती इलेक्ट्रोनों के लिए उत्सर्जन का और धनात्मक पत्ती संग्राहक का काम करेगी इनको क्रमशः पत्ती A और B कह सकते हैं। अब पत्ती A पर कुछ प्रकाश आपतित किया जाता है जिससे इस पत्ती से इलेक्ट्रॉनों का उत्सर्जन होता है जो संग्राहक प्लेट तक पहुँच जाते हैं। आपत्तित प्रकाश की एक सीमा से अधिक आवृत्ति रखने पर इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होते हैं और वो दूसरी प्लेट पर पहुँचने के कारण परिपथ में धारा का प्रवाह होता है। अब यहाँ पर पहला प्रश्न यह बनता है कि प्रयोग में निर्वातित काँच की नली की क्या आवश्यकता थी? इसपर आगे चर्चा करेंगे। इस प्रयोग के परिणामों में पहला परिणाम प्रकाशविद्युत प्रभाव था। यह प्रभाव इस तरह से था कि यदि किसी धातु की पत्ती पर जब किसी निश्चित आवृत्ति से अधिक आवृत्ति का प्रकाश आपत्तित किया जाता है तो उस धातु की पत्ती से इलेक्ट्रोन उत्सर्जित होते हैं जो परिपथ को पूर्ण करते हैं और हमें धारा मिलती है। इन इलेक्ट्रोनों को फोटोइलेक्ट्रोन कहते हैं, इसी तरहा से इन इलेक्ट्रोनों से जो धारा प्रवाहित होती है उसे फोटोकरंट अथवा प्रकाशविद्युत धारा कहते हैं। इस प्रभाव को प्रकाश विद्युत प्रभाव अथवा फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट कहते हैं। यहाँ हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह पुरानी परिभाषा है, नवीन परिभाषा के लिए हम धातु की पत्ती की जगह किसी भी पदार्थ की बात करेंगे। इसके अतिरिक्त प्रकाश की जगह हम विद्युत्चुम्बकीय तरंगों की बात करेंगे। अर्थात् धातु के स्थान पर कोई भी पदार्थ एवं प्रकाश की जगह कोई भी विद्युत्चुम्बकीय तरंग हो सकती है। अब हम कुछ उदाहरण देखते हैं, क्योंकि कुछ पाठकों में यह भ्रम रह जाता है। माना कोई धातु A है जो ν आवृत्ति के प्रकाश पर प्रकाशविद्युत प्रभाव दिखाता है। अब यदि कोई आपको प्रश्न पूछे कि यहाँ प्रकाश के स्थान पर पराबैंगनी किरणें अथवा एक्स किरणें अथवा गामा किरणें डालें तो क्या प्रकाशविद्युत प्रभाव दिखाई देगा? तो इसका उत्तर होगा हाँ, बिलकुल दिखाई देगा, क्योंकि हमने एक न्यूनतम आवृत्ति से अधिक पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव की घटना होने को स्वीकार किया था। इन सभी की आवृत्ति दृश्य प्रकाश से अधिक है। अतः भ्रम न रखें कि केवल प्रकाश किरणों में ही प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाई देता है। इसी तरह से कुछ ऐसे पदार्थ जो धातु की नहीं बनी हैं वो भी प्रकाश विद्युत प्रभाव प्रदर्शित करते हैं अर्थात् हमें धातुओं तक सीमित नहीं रहना है।

    प्रकाशविद्युत् प्रभाव की परिभाषा समझने के बाद हम इसे और समझने का प्रयास करते हैं। हमने परिभाषित करते समय एक न्यूनतम आवृत्ति की बात की। इस न्यूनतम आवृत्ति ν0 को हम क्रांतिक आवृत्ति अथवा देहली आवृत्ति कहते हैं। इससे कम आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होता है। इसके बराबर अथवा ज्यादा आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाई देगा। इसीलिए इसको क्रान्तिक आवृत्ति अथवा देहली आवृत्ति बोलते हैं। इसके बिलकुल विपरीत परिस्थिति लें तो वो होगा तरंगदैर्घ्य। यहाँ शर्त यह होगी कि λ < λ0 अर्थात् λ0 वह अधिकतम तरंगदैर्घ्य है जिसपर कोई धातु अथवा पदार्थ प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाता है। अर्थात् यदि कोई पदार्थ प्रकाशविद्युत् प्रभाव दिखाता है तो उसका तरंगदैर्घ्य λ0 से कम होगा। इस अधिकतम तरंगदैर्घ्य को क्रान्तिम तरंगदैर्घ्य अथवा देहली तरंगदैर्घ्य कहते हैं। इस तरह से हमारी चर्चा क्रांतिक आवृत्ति पर भी हो गयी। अब अपने अगले प्रेक्षण की बात करते हैं। यदि हम दोनों पत्तियों पर आरोपित विभवान्तर ध्रुवता को विपरीत कर दें तो क्या होगा? अथवा हम आरोपित वोल्टता को शून्य कर दें तो क्या होगा, जबकि आपतित विद्युत् चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति देहली आवृत्ति से अधिक है।  या हम ऐसा करें कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव के प्रेक्षण के मध्य में आरोपित वोल्टता को शून्य कर दें तो क्या होगा? या उसी समय हम बैटरी की ध्रुवता बदल दें। अर्थात् उत्सर्जक प्लेट और संग्राहक प्लेट पर विद्युत् विभव का मान परिवर्तित कर दिया तब क्या होगा? इन दोनों ही परिस्थितियों में हमें प्रकाशविद्युत् प्रभाव प्रेक्षित होता है। लेकिन यदि हम नकारात्मक विभव का मान क्रमशः बढ़ाते जायें तो क्या होगा? यहाँ पर नकारात्मक विभव अमीटर की तुलना में है। इसको बढ़ाने से परिपथ में प्रवाहित धारा का मान कम होगा। एक निश्चित वोल्टता पर V0 पर परिपथ में धारा का मान्य शून्य प्राप्त होता है। नकारात्मक वोल्टता में और अधिक वृद्धि करने पर भी धारा का मान शून्य ही रहता है। जिस वोल्टता पर धारा का मान शून्य हो जाता है उस वोल्टता को निरोधी विभव अथवा स्टोपिंग पोटेंशियल कहते हैं। इस तरह से निरोधी विभव को दूसरे शब्दों में इस तरह समझा जा सकता है कि जब उत्सर्जक से इलेक्ट्रॉन निकलते हैं तो उनकी गतिज ऊर्जा अलग अलग होती हैं। उनकी गतिज ऊर्जा शून्य से आरम्भ होकर अधिकतम तक होती है। अर्थात् यह शून्य से आरम्भ होकर अधिकतम तक होती है। हमें लगभग हर ऊर्जा के इलेक्ट्रॉन प्राप्त होते हैं। जब हम नकारात्मक विभव को बढ़ाते हुये V0 तक लेकर आते हैं तो क्या होता है? इस अवस्था में नकारात्मक विभव इलेक्ट्रॉनों को प्रतिकर्षित करता है, यह प्रतिकर्षण वोल्टता के बढ़ने के साथ बढ़ता है। अतः वोल्टता का नकारात्मक मान बढ़ने से संग्राहक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्रोनों की संख्या कम हो जाती है। इससे कम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन संग्राहक तक नहीं पहुँच पायेंगे लेकिन अधिक गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पहुँच जाते हैं। इस तरह से नकारात्मक विभव का मान बढ़ाने से यह होता है कि अधिकतम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन पर संग्राहक तक नहीं पहुँच पाता है। ऐसी अवस्था की अधिकतम गतिज ऊर्जा KEmax और निरोधी विभव V0 में एक सीधा सम्बन्ध होता है। यह सम्बंध KEmax = eV0 से दिया जाता है अर्थात् अधिकतम गतिज ऊर्जा, प्रत्यारोपित वोल्टता और इलेक्ट्रॉन के आवेश के गुणनफल के तुल्य होती है। इस तरह से यहाँ हमने निरोधी विभव के लिए एक सम्बंध स्थापित किया है। अब हम इसका एक आरेख निर्मित करते हैं। यह आरेख हम फोटोकरंट अथवा प्रकाशविद्युत् धारा और वोल्टता के मध्य बनाते हैं। इसको हम पुनः समझने का प्रयास करते हैं कि इन दोनों चरों में क्या सम्बंध है। यदि हम x-अक्ष पर आरोपित वोल्टता और y-अक्ष पर प्रकाशविद्युत् धारा लेते हैं। यहाँ पर संग्राहक और अमीटर के मध्य वोल्टता को लिया गया है। आरेख में हम देखते हैं कि जब संग्राहक की वोल्टता का मान धनात्मक है तो धारा का मान थोड़ा बढ़कर नियत हो जाता है। यहाँ पर हम आपतित प्रकाश अथवा विद्युत्-चुम्बकीय तरंगों की आवृत्ति का मान नियत और देहली आवृत्ति से अधिक लेते हैं। यदि इनकी तीव्रता का मान बढ़ाया जाता है तो धारा का मान भी उसी अनुपात में बढ़ता है। अर्थात् ये प्रेक्षण समान आवृत्ति और अलग अलग तीव्रता पर किया गया है। इससे तीव्रता का मान नियत करके वोल्टता को कम किया जाता है तो हमें देखने को मिलता है कि धारा का मान कम होता है। यहाँ हम पाते हैं कि जब संग्राहक और उत्सर्जक पर वोल्टता का मान समान होता है अथवा दोनों में विभवान्तर शून्य होता है तब भी हमें धारा थोड़ी कम प्राप्त होती है। इसका अर्थ यह है कि कम गतिज ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन संग्राहक तक नहीं पहुँच पाते हैं। अर्थात् कम ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन अपनी ऊर्जा का ह्रास कर देते हैं लेकिन जिनकी आवृत्ति अधिक है वो संग्राहक तक पहुँच जाते हैं और परिपथ को पूर्ण करके हमें धारा प्रदान करते हैं। अब हमनें संग्राहक की वोल्टता को नकारात्मक कर दिया। ऐसी स्थिति में इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षित होना आरम्भ हो जायेंगे और इस वोल्टता का मान और अधिक बढ़ाने पर एक विशेष वोल्टता V0 पर संग्राहक पर पहुँचने वाले इलेक्ट्रोनों की संख्या शून्य हो जाती है, इसका उल्लेख पहले भी किया जा चुका है कि इसे निरोधी विभव कहते हैं। चूँकि हमने पहले समझा है कि तीव्रता का मान बढ़ने पर धारा का मान बढ़ता है लेकिन निरोधी विभव पर धारा का मान प्रत्येक तीव्रता के लिए शून्य ही रहता है। अतः हमें यहाँ से एक महत्त्वपूर्ण परिणाम प्राप्त होता है। जब वोल्टता का मान V0 अथवा गतिज ऊर्जा का अधिकतम मान आपतित प्रकाश की तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। चूँकि हमने अपने आरेख में समान आवृत्ति के लिए भिन्न भिन्न तीव्रताओं के लिए अध्ययन किया लेकिन निरोधी विभव का मान नियत प्राप्त हुआ जो अधिकतम गतिज ऊर्जा के समान है अर्थात् यह तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। इसके अतिरिक्त हमें अन्य परिणाम यह देखने को मिला कि प्रकाशविद्युत् धारा का मान देहली आवृत्ति से अधिक आवृत्ति के लिए आपतित प्रकाश की तीव्रता के समानुपाति होता है। यहाँ हम एक अन्य प्रेक्षण समझते हैं। यदि आरेख में y-अक्ष पर निरोधी विभव और x-अक्ष पर आवृत्ति रखें तो यह सरल रेखा प्राप्त होता है। जिसमें देहली आवृत्ति से कम आवृत्ति के लिए निरोधी विभव का मान शून्य होता है, आवृत्ति का मान बढ़ने पर निरोधी विभव का मान बढ़ता है। इस तरह से एक यह प्रेक्षण हमें प्राप्त होता है। अब यहाँ हमें यह ध्यान रखना होता है कि तीव्रता का मान जैसा सबको ज्ञात है, इकाई समय में इकाई क्षेत्रफल पर आपतित ऊर्जा का मान अर्थात् E/(tA) है, इसको आगे हम प्रयुक्त करेंगे। एकांक क्षेत्रफल पर एकांक समय में आपतित ऊर्जा को तीव्रता कहते हैं। यहाँ एक और प्रेक्षण यह था कि यह प्रक्रिया तात्क्षणिक प्रक्रिया है जिसे अंग्रेज़ी में इंस्टेटेनियस प्रोसेस कहते हैं अर्थात् जैसे ही हमने प्रकाश आपतित करवाया त्यों ही हमें धारा प्राप्त होती है। इसमें लगने वाला समय 10-9 सैकण्ड की कोटि का होता है अतः हम इसे तात्क्षणिक प्रक्रिया कहते हैं। जैसे ही प्रकाश आपतित हुआ, पती से इलेक्ट्रोन निकलते हैं और हमें परिपथ में धारा प्राप्त होती है। ये हमारे प्रायोगिक परिणाम हैं। अब हम चिरसम्मत भौतिकी की असफलता पर चर्चा करते हैं। 

चिरसम्मत भौतिकी की असफलता

    पहले हम चिरसम्मत भौतिकी की अवधारणा को समझेंगे कि यह इन प्रायोगिक परिणामों के सम्बंध में क्या अपवाद हैं? फिर हम इसकी असफलता को देखेंगे। चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार तरंग की तीव्रता (चूँकि हम यहाँ विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को काम में ले रहे हैं) का मान इसके आयाम के वर्ग के अनुक्रमानुपाती होता है जो हमने यांत्रिकी में तरंगों का अध्ययन, रस्सी की तरंगे अथवा विद्युत्चुम्बकीय तरंगों में तरंग का अध्ययन करते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि जब हम किसी तरंग की आवृत्ति के मान में वृद्धि करते हैं तो हम उसके आयाम में वृद्धि कर रहे हैं जिसका अर्थ यह हुआ कि हम इलेक्ट्रॉन पर लगने वाले बल को बढ़ा रहे हैं जो उसके वेग में वृद्धि का कारण बनता है और उससे इलेक्ट्रॉन की गतिज ऊर्जा में वृद्धि होनी चाहिए। अर्थात् हम तीव्रता में वृद्धि करके इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा में वृद्धि कर सकते हैं। लेकिन हमने प्रायोगिक परिणामों में देखा कि तीव्रता में वृद्धि होने पर इलेक्ट्रोनों की गतिज ऊर्जा नहीं बढ़ती अर्थात् इलेक्ट्रोनों की गतिज ऊर्जा का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। अतः चिरसम्मत भौतिकी इस परिणाम को समझाने में असफल रही। अतः चिरसम्मत भौतिकी प्रयोगिक परिणाम को नहीं समझा सकी और असफल रही। प्रायोगिक परिणाम में उपर उल्लिखित आरेख में हमने पाया कि सभी तीव्रता की तरंगों के लिए धारा, एक निश्चित वोल्टता पर शून्य हो गयी। दूसरा परिणाम तरंग सिद्धान्त से समझें तो हम पाते हैं कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव किसी भी आवृत्ति पर प्राप्त होना चाहिए। अर्थात् हम किसी भी आवृत्ति पर प्रकाशविद्युत् प्रभाव देख सकते हैं यदि एक निश्चित् तीव्रता की तरंगे आपतित होती हैं, ऐसा चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार होना चाहिए। लेकिन यह परिणाम भी प्रायोगिक रूप से गलत पाया गया। चूँकि हमने पाया कि तीव्रता बढ़ाने से प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं प्राप्त किया जा सकता यदि आपतित विकिरणों की आवृत्ति एक न्यूनतम आवृत्ति से कम है। अतः चिरसम्मत भौतिकी की यह संकल्पना भी गलत सिद्ध होती है। तीसरा प्रेक्षण यह है कि चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार माध्यम में तरंग संचरण तरंगाग्रों के रूप में होता है। तरंगाग्र माध्यम में उन बिन्दुओं के बिन्दुपथ को कहते हैं जहाँ तरंग समान कला में दोलन करती है। ये कई तरह के हो सकते हैं यह अपने स्रोत पर निर्भर करती हैं। यदि अपना स्रोत सममित गोलीय अथवा बिन्दु स्रोत है तो तरंगाग्र गोलीय अथवा गोलाकार होंगे यदि हमारा स्रोत बेलनी है तो तरंगाग्र बेलनाकार होंगे और यदि स्रोत बहुत अधिक दूरी पर स्थित हो तो हमें प्राप्त तरंगाग्र समतल होंगे। अर्थात् चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार तरंग की ऊर्जा का संचरण तरंगाग्रों से होता है और इसका वितरण तरंगाग्रों में समांगी होता है। अर्थात् यदि हम किसी तरंगाग्र की कल्पना करते हैं तो उसके प्रत्येक बिन्दू पर समान ऊर्जा वितरित हो रही है यदि इसके पिछे दूसरा तरंगाग्र आ रहा है और उसके आगे भी तरंगाग्र हो सकता है। इस तरह से तरंग संचरण हो रहा है तो इस पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का वितरण एकसमान अथवा समांगी रहता है ऐसा चिरसम्मत भौतिकी में तरंग सिद्धान्त में माना जाता है। अब जब यह तरंगाग्र किसी धातु की सतह पर आपतित होता है तो चूँकि यह कुछ क्षेत्रफल पर आपतित होगी और उसमें स्थिति सभी इलेक्ट्रोनों को समान रूप से प्राप्त होगी। अतः चिरसम्मत भौतिकी के अनुसार यदि इलेक्ट्रोनों को पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है तो इलेक्ट्रोन अगले तरंगाग्र की प्रतीक्षा करेगा यदि फिर भी इलेक्ट्रोन के उत्सर्जन के लिए पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त नहीं होती है तो यह उससे अगले तरंगाग्र की प्रतीक्षा करेगा। अर्थात् इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित होने से पहले बहुत बड़ी मात्रा में तरंगाग्रों की प्रतिक्षा करेगा। इसका मतलब यह हुआ कि तरंगाग्रों का धातु की पत्ती पर आपतन और इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन में कुछ समय लगेगा। अर्थात् कुछ समय विलम्ब होना चाहिए जबकि हमने अभी प्रायोगिक परिणामों में देखा कि प्रकाश के आपतन और इलेक्ट्रॉन के उत्सर्जन में कोई विलम्ब नहीं होता। अतः तरंगाग्र के अनुसार आने वाला समय के विलम्ब की अवधारण भी असफल रहती है। अर्थात् चिरसम्मत भौतिकी यह समझाने में असफल रही कि इन प्रायोगिक परिणामों को कैसे समझाया जाये। तो हमने इतिहास देखा, प्रायोगिक परिणाम देखे, उसके पश्चात् चिरसम्मत व्याख्या देखी। एक-एक करके हमने पाया कि चिरसम्मत अवधारणा प्रायोगिक परिणामों को समझाने में असफल रहे हैं तब उस समय हमारे सामने जो सिद्धान्त आया वो आइंस्टीन ने प्रस्तावित की। तो अब हम इसके अगले बिन्दु का अध्ययन करते हैं कि आंइस्टीन ने क्या सिद्धान्त प्रस्तावित किया और कैसे इनका सिद्धान्त फोटो-इलेक्ट्रोन अथवा प्रकाशविद्युत् प्रभाव को समझाता है।

आइंस्टीन की व्याख्या

    जैसा कि हमने पिछले ब्लोग में कृष्णिका विकिरण का अध्ययन किया। कृष्णिका विकिरण के लिए प्लांक सिद्धान्त की चर्चा की। प्लांक के अनुसार कोटर में उपस्थित दोलक, अप्रगामी तरंगों को अपनी ऊर्जा का स्थानान्तरण, जो कि धातु से तरंगों में होता है, वह विविक्त है। अर्थात् धातु से तरंगों के मध्य ऊर्जा का स्थानान्तरण विविक्त है। उस समय प्लांक ने माना कि जो विकिरण हैं वो एक बार दोलक से ऊर्जा प्राप्त करने के पश्चात् वो सामान्य तरंगों की तरह व्यवहार करती हैं अर्थात् संचरण में तरंगों की तरह व्यवहार करती हैं। लेकिन आइंस्टीन ने इस सिद्धान्त को नहीं माना बल्कि आइंस्टीन ने माना कि प्रकाश तरंगें भी कणों से मिलकर बनी हैं जिन्हें हम यहाँ पर फोटोन कहते हैं। आइंस्टीन ने पहली बार प्रतिपादित किया कि विद्युत्चुम्बकीय विकिरणें पदार्थ से जो ऊर्जा प्राप्त करती हैं, केवल वह विविक्त नहीं है जबकि इनका संचरण भी विविक्त होता है जो E = nhν के अनुसार विविक्त रहता है। यहाँ पर ऊर्जा hν को फोटोन कहते हैं। यह पहली बार आइंस्टीन ने बताया। अर्थात् आइंस्टीन के अनुसार यदि निश्चित तीव्रता पर अधिकतम गतिज ऊर्जा, आवृत्ति का फलन होनी चाहिए। जैसा हमने आरेख में देखा था, अर्थात् आवृत्ति बढ़ने पर अधिकतम गतिज ऊर्जा का मान बढ़ना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि निरोधी विभव का मान भी बढ़ना चाहिए। इस तरह आइंस्टीन की यह परिकल्पना बिलकुल सही थी जो प्रायोगिक मानों की पुष्टि करता है। उनकी दूसरी परिकल्पना यह थी कि फोटो-कैथोड़, जिसे हमने उत्सर्जक कहा है, पर आने वाली विकिरणें जब आपतित होती हैं तो वो फोटोन के रूप में आती हैं। इस बार वो सतत नहीं हैं, तरंगाग्र के रूप में नहीं आ रही। आइंस्टीन की व्याख्या के अनुसार वो फोटोन के रूप में आ रही हैं, कुछ कणों के रूप में आ रही हैं। अतः एक फोटोन केवल एक इलेक्ट्रॉन से ही क्रिया करता है। अतः एक इलेक्ट्रॉन, एक फोटोन को पूर्णतः अवशोषित कर लेता है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण अवधारणा है, तरंग सिद्धान्त में ऐसा नहीं था। यहाँ पर एक इलेक्ट्रॉन अपने उपर गिरने वाले एक फोटोन का अवशोषण करता है और यदि उस फोटोन की ऊर्जा पर्याप्त है, अर्थात् hν में ν आपतित विकिरण की आवृत्ति है जो एक न्यूनतम आवृत्ति से अधिक है तो फोटोन इलेक्ट्रॉन के साथ अवशोषित होकर उस इलेक्ट्रॉन को बाहर निकाल देता है। अतः यह इसका समर्थन करता है कि इस प्रक्रिया में कोई समय नहीं लगेगा। अर्थात् इलेक्ट्रॉन बाद में आने वाले फोटोन की प्रतीक्षा नहीं करता है। अतः इलेक्ट्रॉन अन्य फोटोनों की प्रतीक्षा नहीं अक्रता और एक ही फोटोन को पूर्णतः अवशोषित करता है। यदि यह पर्याप्त ऊर्जा है तो वो बाहर निकलेगा और यदि यह पर्याप्त नहीं है तो वो पदार्थ के अन्दर ही रहेगा। अब हम आगे देखते हैं कि इससे आइंस्टीन ने क्या बताया। इसमें आगे बढ़ने से पहले हम कार्यफलन को परिभाषित करते हैं। हम न्यूनतम आवृत्ति से अधिक आवृत्ति की बात करते हैं तो यह न्यूनतम ऊर्जा किसका फलन है? किसपर निर्भर करती है? इसकी निर्भरता पदार्थ पर होती है। इसके लिए सही शब्द कार्यफलन है। कार्यफलन किसे कहते हैं? वह न्यूनतम ऊर्जा जो किसी इलेक्ट्रोन को धातु की सतह से अलग करने के लिए आवश्यक हो, उसे उस धातु के कार्यफलन के रूप में जाना जाता है। किसी धातु की सतह से किसी इलेक्ट्रोन को बाहर निकालने के लिए आवश्यक न्यूनतम ऊर्जा को उस धातु का कार्यफलन कहते हैं। इसे अंग्रेज़ी में वर्क-फंक्शन कहते हैं। यह किसका गुणधर्म है? तो यह पदार्थ का गुणधर्म है। यह अलग अलग धातुओं के लिए अलग अलग होता है। तो किसी भी धातु से इलेक्ट्रॉन को निकालने के लिए ऊर्जा देनी होगी। उस ऊर्जा के बिना इलेक्ट्रॉन बाहर नहीं आयेगा उसको कार्यफलन कहते हैं। इसे हम फाई (φ) से लिखते हैं और इसको हम hν0 के समान लिखते हैं जहाँ ν0 देहली आवृत्ति है, यह वह आवृत्ति है जिससे कम आवृत्ति पर इलेक्ट्रॉन का उत्सर्जन नहीं होगा। कार्यफलन जैसा ही हम एक अन्य भौतिक राशी का भी अध्ययन करते हैं जिसे आयनीकरण विभव कहते हैं। यहाँ एक जैसे दो बिन्दू आ रहे हैं अतः हम इसकी चर्चा कर रहे हैं। कार्यफलन की तरह आयनीकरण ऊर्जा की परिभाषा यह है कि किसी विलगित परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन उत्सर्जित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा को उस परमाणु की आयनीकरण विभव कहते हैं। अतः किसी परमाणु से इलेक्ट्रोन निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा को आयनीकरण ऊर्जा कहते हैं और एक धातु से इलेक्ट्रोन निकालने को कार्यफलन कहते हैं। क्या आप दोनों में सम्बंध स्थापित कर सकते हैं? कार्यफलन का मान लगभग आयनीकरण विभव का आधा होता है। ऐसा क्यों होता है, क्या आप बता सकते हैं? ऐसा इसलिए होता है धातु के अन्दर बहुत परमाणु एकसाथ बैठे होते हैं अतः उनकी स्थितिज ऊर्जा का मान, एक दूसरे के प्रभाव को कम करने से कम हो जाती है और केवल सीमायें अलग रहती हैं। लेकिन आयनीकरण में परमाणु विलगित है अतः उससे इलेक्ट्रॉन निकालने के लिए हमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होगी। ये समानार्थी विषय होने के हमने इसकी चर्चा की। अब हम आगे बढ़ते हैं। अब हम कुछ धातुओं को उदाहरण के रूप में लेते हैं और उनके कार्यफलन का मान लिखते हैं। सीज़ियम, पोटैशियम और सोडियम के कार्यफलन का मान क्रमशः 1.9 eV, 2.2 eV और 2.3 eV हैं, ये आपको याद होना चाहिए कि कार्यफलन का मान हम इलेक्ट्रॉन वोल्ट में रखते हैं। अब हम आइंस्टीन की प्रकाशविद्युत् प्रभाव समीकरण की बात करते हैं।

    प्रकाशविद्युत् प्रभाव समीकरण की परिकल्पना आइंस्टीन ने कैसे की? माना कि आपतित फोटोन की ऊर्जा hν है और धातु के लिए कार्यफलन का मान hν0 है। अब हम दो परिस्थितियों की चर्चा करते हैं। पहला जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से अधिक है और दूसरा जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से कम है। पहली अवस्था में जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से अधिक है तब हमें प्रकाशविद्युत् देखने को मिलेगा और अन्य स्थिति में जब आपतित फोटोन की ऊर्जा कार्यफलन से भी कम है तो प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होगा। अतः आइंस्टीन ने यह बताया कि इनका अन्तर (hν - hν0) इस तरह से होगा, कि इलेक्ट्रॉन को बाहर निकालने के लिए हमें hν0 ऊर्जा देनी होगी और हमारे पास hν ऊर्जा है और इनका अन्तर वो ही इलेक्ट्रॉन की अधिकतम गतिज ऊर्जा होगी। यहाँ से हमारे पास जो समीकरण आती है वो अधिकतम गतिज ऊर्जा = hν - hν0 है जिसे कई बार hν - φ भी लिख देते हैं। इसे हम आइंस्टीन की प्रकाश विद्युत् समीकरण लिखते हैं। अधिकतम गतिज ऊर्जा को यदि KEmax लिखें तो हम उपरोक्त समीकरण को KEmax = (1/2)mvmax = hν - hν0 भी लिख सकते हैं। गतिज ऊर्जा को निरोधी विभव (stopping potential) के रूप में लिखने पर KEmax = eV0 = hν - hν0 लिख सकते हैं। अब हम और आगे देखते हैं। अब देखिये यहाँ पर अपने पास में यह समीकरण आयी V0 = (h/e)ν - (h/e)ν0 जिसको हमने एक बॉक्स में बन्द कर दिया। क्यों कर दिया? क्योंकि यह y = mx + c की तरह एक रेखा की समीकरण है जिसमें c अंतःखण्ड (y-अक्ष पर) होता है और m उसका ढ़ाल होता है। अतः उपरोक्त समीकरण में हम देखें तो हमें ज्ञात होगी कि निरोधी विभव और आवृत्ति में जो ग्राफ प्राप्त होता है वो रेखीय होना चाहिए। हमने पहले x-अक्ष पर ν0 से आरम्भ होने वाला ग्राफ बनाया था अतः यह वही ग्राफ प्राप्त होता है। इस समीकरण में हमें y-अक्ष पर अंतःखण्ड का मान -h/e प्रात हुआ है अतः यह मान हमें नकारात्मक अक्ष पर मिलेगा जो φ=-hν0/e होगा। इसमें ढ़ाल tanθ का मान m=h/e प्राप्त होता है जहाँ h प्लांक नियतांक और e इलेक्ट्रॉन का आवेश है, जो दोनों की सार्वभौमिक नियतांक हैं। इसका अर्थ है कि सभी पदार्थों के लिए आवृत्ति और निरोधी विभव के मध्य ग्राफ का ढ़ाल नियत रहेगा। ढ़ाल नियत रहने का अर्थ है रेखायें समान्तर होंगी। अतः एक धातु का ग्राफ यदि एक जगह है तो दूसरे धातु का ग्राफ भी इसके बायीं अथवा दायीं तरफ इसके समान्तर रेखा के रूप में प्राप्त होगा। अर्थात् इन सभी का ढ़ाल समान और नियत रहेगा। यह बहुत ही उपयोगी परिणाम है और कई बार परीक्षाओं में पूछा जाता है। इसके पीछे की भौतिकी बहुत ही सुन्दर है कि रेखायें का ढ़ाल h/e है जो कि सार्वभौमिक नियतांक है और सभी पदार्थों के लिए समान रहती है। फिर अलग क्या होता है? अंतःखण्ड अलग अलग होता है और अंतःखण्ड वास्तव में क्या है? यह (h/e)ν0 है। h/e यहाँ पर भी सार्वभौमिक नियतांक है लेकिन इसके साथ में ν0 भी है। ν0 देहली आवृत्ति है जो कि पदार्थ का गुणधर्म है अतः अंतखण्ड सभी पदार्थों के लिए अलग-अलग मिलता है लेकिन ढ़ाल समान रहता है। इस तरह यह समीकरण प्रायोगिक परिणामों के साथ सुम्मेलित होती है और प्रायोगिक परिणाम और समीकरण समान परिणाम देते हैं अर्थात् प्रायोगिक परिणामों पूर्ण व्याख्या इस समीकरण से प्राप्त होती है।

    अब आइंस्टीन के सिद्धान्त के बारे में हम परिणाम के रूप में क्या कह सकते हैं? वो यह है कि अधिकतम गतिज ऊर्जा और निरोधी विभव का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। चूँकि तीव्रता का मान फोटोनों की एकांक समय में एकांक क्षेत्रफल में संख्या को कहते हैं। अतः यदि एक फोटोन की ऊर्जा को हम E लिखें तो यह nE/(tA) तीव्रता को निरूपित करता है जहाँ n फोटोनों की संख्या है। अतः तीव्रता बढ़ाने का अर्थ यह है कि हम फोटोनों की संख्या बढ़ा रहे हैं न कि तीव्रता में परिवर्तन कर रहे हैं अतः अधिकतम गतिज ऊर्जा और निरोधी विभव का मान तीव्रता पर निर्भर नहीं करता। यह पहला परिणाम है जो समीकरण द्वारा समझाया जा सकता है। इस प्रकार हम तीव्रता बढ़ाकर प्रकाशविद्युत् धारा का मान तो बढ़ाते हैं लेकिन निरोधी विभव अथवा अधिकतम गतिज ऊर्जा का मान नहीं बढ़ाते। यह उपर समझाये गये ग्राफ से सहमत है जिसमें हम विभिन्न धाराओं के बारे में चर्चा कर रहे थे। दूसरा परिणाम यह है कि यदि आवृत्ति का मान ν0 से कम है तो प्रकाशविद्युत् प्रभाव नहीं होगा और यह भी प्रायोगिक परिणामों से सहमत है। तीसरा परिणाम यह है कि एक फोटोन एक इलेक्ट्रॉन द्वारा पूर्णतः अवशोषित हो जाता है। यदि फोटोन की ऊर्जा देहली ऊर्जा से अधिक है तो एक इलेक्ट्रॉन, उस फोटोन को पूर्णतः अवशोषित करके उसी समय उत्सर्जित हो जायेगा और इसमें समय नहीं लगेगा। अतः प्रायोगिक परिणामों में चिरसम्मत भौतिकी असफल रही क्योंकि उसमें माना गया कि विद्युत्चुम्बकीय विकिरणें तरंग रूप में मानी गयी जबकि भौतिकी के इतिहास में यहाँ पहली बार यह बताया गया कि ये विकिरणें भी छोटे-छोटे कणों से मिलकर बनी होती हैं और बाद में इन कणों को फोटोन नाम दिया गया। इस फोटोन के अस्तित्व को स्वीकार करते हुये आइंस्टीन ने प्रकाशविद्युत् प्रभाव को सफलतापूर्वक समझाया। आइंस्टीन ने भौतिकी के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं काम किया है जैसे उष्मागतिकी और सांख्यिकीय भौतिकी में काम किया है, आइंस्टीन ने विशिष्ट आपेक्षितकता पर स्वयं काम किया है, आइंस्टीन क्वांटम यांत्रिकी के प्रणेता थे जिसे अंग्रेज़ी में गॉडफादर कहते हैं लेकिन इन सबके बावजूद आइंस्टीन को 1921 में प्रकाशविद्युत् प्रभाव के इसी काम के लिए मिला। आइंस्टीन ने यह काम वर्ष 1905 में किया था लेकिन इसके काम के लिए वर्ष 1921 में आइंस्टीन को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अब हम छोटी सी चर्चा इसपर करते हैं कि फोटोन क्या होता है?

फोटोन

    फोटोन क्या होता है? पहली बार किसने बताया? सबसे पहले आइंस्टीन ने बताया कि विद्युत्चुम्बकीय तरंगों का प्रसरण, जो ऊर्जा रखती हैं वो भी कण रूप में होती हैं और उसको नाम दिया फोटोन। अतः हम यहाँ एक वाक्य लिख सकते हैं कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण रूप को प्रदर्शित करता है। प्रकाशविद्युत् प्रभाव क्या प्रदर्शित करता है? प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण स्वरूप को बताता है। तरंगों का कण रूप! कुछ दुविधा हुई? बहुत कुछ मिश्रित हुआ। इस श्रेणी के पहले ब्लॉग में हमने चर्चा की थी कि चिरसम्मत यांत्रिकी कण और तरंग को एकदम अलग और अनन्य घटना मानती है लेकिन क्वांटम यांत्रिकी में कण और तरंग अलग-अलग जैसा कुछ नहीं होता। यहाँ पर विद्युत्चुम्बकीय तरंगों को तरंग रूप में माना जाये तो हम प्रकाशविद्युत् प्रभाव को नहीं समझा सकते। अतः इसीलिए लिखा है कि प्रकाशविद्युत् प्रभाव तरंगों के कण रूप को निरूपित करता है। यहाँ कौनसी तरंगों की बात कर रहे हैं? ये चिरसम्मत तरंगों की बात कर रहे हैं जिनको अब तक हम चिरसम्मत तरंगों के रूप में देख रहे थे वो क्वांटम यांत्रिकी में कुछ प्रयोगों में कण जैसा व्यवहार प्रदर्शित कर रही हैं। अब यहाँ से ही बात करते हैं कि क्वांटम यांत्रिकी में एक फोटोन एक कण के रूप में व्यवहार रखता है। यह सामान्य कण नहीं है, ये क्वांटम यांत्रिकी का कण है। यह कैसा कण है? यह ऐसा कण है जिसका विराम द्रव्यमान शून्य है। विराम द्रव्यमान आप समझते हैं? जिसे हम m0 से निरुपित करते हैं जो आपने विशिष्ट आपेक्षिकता में भी पढ़ा है। इसका मतलब क्या है? इसका भौतिक अर्थ क्या है? इसका अर्थ है कि फोटोन विराम में नहीं रहता। अर्थात् यदि फोटोन अस्तित्व में है तो हमेशा c वेग से गति करता है। यह कभी विराम में नहीं रहता क्योंकि इसका विराम द्रव्यमान शून्य है जिसका अर्थ है कि यह हमेशा c वेग से ही गति करता है। इसके अतिरिक्त फोटोन की ऊर्जा hν होती है जहाँ ν विकिरण की आवृत्ति को निरूपित करता है। इसका संवेग क्या होता है? इसका संवेग E/c होता है। चूँकि यह एक कण है अतः इसका संवेग भी होता है। जैसे अन्य कणों के लिए एक भौतिक राशी संवेग होती है वैसे ही फोटोन के लिए भी संवेग होता है और उसे E/c से लिखा जाता है जिसे हम hν/c अथवा h/&;lambda; भी लिख सकते हैं। आपेक्षिकता का सूत्र हम E2 = p2c2 + m02c4 से लिखते हैं जो किसी भी कण के लिए ऊर्जा और द्रव्यमान में सम्बंध को बताता है। यह सम्बंध द्रव्यमान, ऊर्जा और संवेग के सम्बंध को बताता है। जब न्यूटनीय यांत्रिकी असफल हो जाती है जिसमें कण का वेग प्रकाश के वेग के तुल्य (एक ही कोटि का) हो जाता है तब इस सूत्र से हम सम्बंध बताते हैं। अब हम यहाँ देखते हैं कि फोटोन के लिए विराम द्रव्यमान शून्य होता है अतः E2 = p2c2 प्राप्त होता है जिससे हम p=E/c लिख सकते हैं। अर्थात् यह कण विशिष्ट आपेक्षिकता के उस सूत्र में भी सटीक परिणाम देता है जिसमें हम द्रव्यमान-ऊर्जा सम्बंध के रूप में स्थापित करते हैं, यहाँ ध्यान रहे कि फोटोन का विराम द्रव्यमान शून्य है। इस तरह से हमनें संक्षिप्त में बताया कि एक फोटोन के क्या क्या गुणधर्म होते हैं? अब इस ब्लॉग को हम यहाँ पूर्ण करते हैं जिसमें हमने बात की कि क्यों प्रकाशविद्युत् प्रभाव महत्त्वपूर्ण है? उसके क्या क्या विभिन्न पहलू हैं? कौन कौनसे वैज्ञानिकों ने इसमें योगदान दिया? चिरसम्मत भौतिकी कैसे प्रकाशविद्युत् प्रभाव को समझाने में असफल रही और आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने एक क्रान्तिकारी विचार रखते हुये कि प्रकाशविद्युत् विकिरणें तरंगों के रूप में नहीं बल्कि छोटे-छोटे कणों के रूप में ऊर्जा को को प्रसरित करती हैं, जैसे विचार से इसको सफलतापूर्वक समझाया और इसके लिए उन्हें 1921 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। तो ये था आज के हमारे इस फोटोइलेक्ट्रिक इफेक्ट के बारे में। धन्यवाद!

उपरोक्त विषय की वीडियो के रूप में व्याख्या के लिए निम्नलिखित वीडियो देखें:



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